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क्या अपाहिज भ्रूणों को मार देने के बाद भी डाक्टर को मसीहा कहा जा सकता है ? 'Spina Bifida'

मेरी बेटी अनम का नाम हिंदी ब्लॉग जगत के लिए एक जाना पहचाना नाम है। हिंदी ब्लॉग जगत में उसकी उम्र के किसी बच्चे का  इतना चर्चा नहीं हुआ, जितना कि उसका हुआ है। यह ठीक वही वक्त है जब हमने अपनी प्यारी अनम को उसके झूले में मृत पाया था। आज से ठीक एक साल पहले 21 और 22 जुलाई की दरम्यानी रात को जब वह सोई तो हम नहीं जानते थे कि सुबह को उसके पालने से जब हम उसे उठाएंगे तो वह हमें एक बेजान लाश की शक्ल में मिलेगी। महज़ 22 दिन इस दुनिया में रहकर वह चल बसी और अच्छा ही हुआ कि वह चल बसी। 'Spina Bifida' की वजह से वह पैदाइशी तौर पर एक अपाहिज बच्ची थी। उसकी दोनों टांगें बेकार थीं। उसके सिर की हड्डियों के बनने में भी कुछ कमी रह गई थी और उसकी रीढ़ की हड्डी भी तिरछी थी। उसकी पैदाइश से पहले जब लेडी डाक्टर मीनाक्षी राना ने उसकी सेहत को जांचने के लिए अल्ट्रा साउंड करवाया तो ये सब बातें उसकी रिपोर्ट में सामने आ गईं। डाक्टर मीनाक्षी ने कहा कि इस बच्ची को पैदा नहीं होने देना है, यह अपाहिज है और आपके किसी काम की नहीं है। हमने पूछा कि यह ज़िंदा तो है न ? उन्होंने कहा कि हां ज़िंदा तो है। तब हमने कहा कि वह ...

युद्ध -लुईगी पिरांदेलो (मां-बेटे और बाप के ज़बर्दस्त तूफ़ानी जज़्बात का अनोखा बयान)

लुईगी पिरांदेलो जन्म : 28 जून 1867 को सिसली में। साहित्य के लिए 1934 का नोबेल पुरस्कार। ‘दि ओल्ड एंड द यंग’, ‘हेनरी कश्’, ‘एज यू डिजायर मी’ आदि प्रमुख रचनाएं। मृत्यु: 10 दिसंबर 1936 रात की गाड़ी (एक्सप्रेस) से रोम से चलने वाले मुसाफिर फैब्रियानो के छोटे-से स्टेशन पर सुबह होने तक रुके थे, ताकि उस छोटी और पुरानी फैशन वाली लोकल से आगे का सफर जारी रख सकें, जो सुल्मोना में मुख्य लाइन से मिलती थी। भोर में, दूसरे दर्जे के भरे हुए और धुआएं से डिब्बे में, जिसमें पांच लोग पहले से ही रात बिता चुके थे, गहरे शोक में डूबी एक भारी-भरकम महिला अंदर आई, जो करीब-करीब एक आकारविहीन गठरी की तरह थी। उसके पीछे हांफता और कराहता एक दुबला शख्स था, पतला और कमजोर-सा। उसका चेहरा बेजान सफेद था, उसकी आंखें छोटी और चमकीली थीं और लजालु और बेचैन दिख रही थीं। आखिरकार एक सीट पा लेने के बाद उसने विनम्रतापूर्वक मुसाफिरों को धन्यवाद दिया, जिन्होंने उसकी पत्नी की मदद की और उसके लिए जगह बनाई। इसके बाद उसने महिला की तरफ घूम कर उसके कोट का कॉलर नीचे करने की कोशिश की और विनम्रतापूर्वक पूछा: ‘तुम ठीक तो हो न, प्रिय?’...

इतना घमंडी बच्चा ! -सुषमा कुमारी

मिसेज शर्मा की परेशानी दिनोदिन बढ़ती ही जा रही है। पहले तो मनाने से उनकी बेटी बड़ों के पांव भी छू लेती थी। यही नहीं, गलती हो जाने पर उनसे माफी भी मांग लेती थी, लेकिन पिछले कुछ समय से न जाने क्या हुआ है कि समझाने और मनाने तो दूर, डांटने-फटकारने और यहां तक कि पिटाई करने के बाद भी वह न तो मेहमानों के पांव ही छूती है और न ही अपनी गलती पर उनसे सॉरी कहती है। अगर आप भी अपने बच्चे के ऐसे ही व्यवहार से परेशान हैं, तो संभव है कि वह भी मिसेज शर्मा की बेटी की तरह घमंडी होता जा रहा है। अपोलो हॉस्पिटल में क्लीनिकल एंड चाइल्ड साइकोलजिस्ट डॉ. धीरेन्द्र कुमार बच्चों के इस व्यवहार के लिए कई चीजों को जिम्मेदार मानते हैं। अब एकल परिवार का चलन बढ़ा है, जहां बच्चे केवल माता-पिता के साथ बड़े होते हैं। पेरेंट्स बच्चे की उपलब्धियों को अपनी आन-बान से जोड़कर चलने लगते हैं। परिणाम यह होता है कि बच्चे की हर छोटी-बड़ी मांग पूरी की जाती है। धीरे-धीरे बच्चे को इसकी आदत हो जाती है और कुछ समय बाद बच्चे को भी खुद पर गर्व होने लग जाता है कि वे जो चाहते हैं वह पूरा होता जाता है। बच्चों को गर्व और घमंड के बी...
ममतामयी माँ मदर टेरेसा  ममतामयी,गरिमामयी  माँ का रूप थीं वो सफेद साड़ी मैं लिपटी उजली सुबह -२ की धूप थीं वों  स्नेहिल मुस्कान मुख पर लिए शांति की दूत थीं वो  सर्वत्र प्यार का प्रसार करने वाली भगवान् की मूरत थीं वो  निसहाय इंसानों, अनाथ बच्चों  की आश्रयदाता थीं वो  किसी सत्ता,ऊँचे पदों, और लालच की ना मोहताज थीं वो  इस दुनिया में इंसानियत की मिसाल थीं वो  सही मायने में एक महान इंसान थीं वो  हमारे धन्य-भाग्य  की भारत में बस गईं थीं वो  भारत में रहने वाली अनमोल  "भारत -रत्न"  थीं वो  भारत की ही नहीं सारी दुनिया की मदर थीं वो  धरती माँ के समान सहनशील माँ मदर टेरेसा थीं वो  ऐसी माँ को शत-शत नमन करती हूँ मैं  उनकी महान आत्मा के लिए हर पल दुआ करती हूँ मैं

माँ कभी मरती नही हैं ..?

माँ कभी मरती नही हैं ..? वो सिर्फ जिस्म छोडती हैं ,चोला बदलती हैं ,अपने बच्चो से बिदा लेती हैं ! हर माँ अपने आप में परिपूर्ण होती हैं ! स्त्री का बस 'माँ' होना ही अपने आप में सम्पूर्ण हैं | पुरुष तो जीवन -भर  ' माँ ' का अनुचर ही होता हैं ,जीवन -भर माँ बनने का प्रयास करता रहता  हैं पर सिर्फ 'पिता' बनकर रह जाता हैं ! पर माँ अपनी साधना से पुरुष को अमृत पिला कर महाबली बनाती है ? इसलिए माँ कभी मरती नहीं..? वो अपने विचारो से, अपनी आकांशाओ से,अपने समर्पण से, हमेशा जीवित  रहती है ..और हम जब तक उसके साए में रहते हैं तब तक सुरक्षित रहते हैं ! जैसे ही वो साया हमारे ऊपर से उठ जाता हैं तो हम निरह प्राणी बन जंगल -जंगल  घूमते रहते हैं ..एक अनबुझ प्यास के लिए ..? फिर वो अमृत हमे नही मिलता ???   

माँ ! वो पारस है !

माँ ! वो पारस है ! कभी माँ के थके पैरों को दबा कर देखो ख़ुशी जन्नत की अपने दिल में तुम पा जाओगे . जिसने देकर के थपकी सुलाया है तुम्हे क्या उसे दर्द देकर चैन से सो पाओगे ? करीब बैठकर माँ की नसीहतें भी सुनो कई गुस्ताखियाँ करने से तुम बच जाओगे . उसने हर फ़र्ज़ निभाया है बड़ी तबियत से उसके हिस्से का क्या आराम तुम दे पाओगे ? उम्रदराज़ हुई चल नहीं वो पाती है उसे क्या छोड़ पीछे आगे तुम बढ जाओगे ? जिसने कुर्बान करी अपनी हर ख़ुशी तुम पर उसके होठों पे क्या मुस्कान सजा पाओगे ? तुम्हे छू कर के मिटटी से बनाती सोना माँ ! वो पारस है उसे भूल कैसे पाओगे ? शिखा कौशिक http://shikhakaushik666.blogspot.com

बचपन बर्बाद कर रहा है वीडियो गेम Save your kids

बच्चों के जीवन का अभिन्न अंग बन चुके वीडियोगेम माता-पिता भले ही बड़े लाड़ से उन्हें देते हों, लेकिन विशेषज्ञों और चिकित्सकों का मानना है कि यह उनकी स्वाभाविक मासूम सोच को खत्म कर उन्हें हिंसा की ओर प्रवृत्त कर रहे हैं। बच्चों को बेहतर भौतिक सुविधाओं से भरपूर जीवन देने के लिए दिन-रात पैसे कमाने में जुटे अभिभावक इस छोटी मगर बेहद जरूरी बात पर ध्यान ही नहीं देते। जब तक उन्हें यह बात समझ आती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इसके बारे में फोर्टिस अस्पताल की मनोविश्लेषक डॉक्टर वंदना प्रकाश ने बताया कि वीडियो गेम बच्चों की मासूमियत को खत्म कर रहे हैं। आजकल बनने वाले ज्यादातर वीडियोगेम में सिर्फ हिंसा और बदले की भावनाएं दिखाई जाती हैं। अनजाने में बच्चों वही सीखते हैं। वह कहती हैं, बच्चों के बीच सबसे मशहूर वीडियो गेम मारियो में भी हिंसा दिखाई जाती है। आजकल सीडी हो या इंटरनेट वीडियो गेम सभी की थीम हिंसा ही होती है। उसमें बच्चों को गोलियां चलाना और लोगों को मारना होता है। ऐसे में बच्चों को धीरे-धीरे इन बातों में कोई बुराई नजर नहीं आती। बच्चों के मनोविज्ञान पर काम करने वाले मनोविशलेषक डॉक्...