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Showing posts from March, 2012

बेटी के हाथ पीले करने के लिए पिता ने लिए सात फेरे

हरदोई/एजेंसी ! बेटी के हाथ पीले करने की खातिर किसी बाप को अगर पहले अपने हाथ पीले करने पडे़ तो यह सुनने में ही अजीब लगेगा लेकिन उत्तरप्रदेश के एक जिले में बेटी की शादी के लिए पहले पिता के विवाह करने का मामला प्रकाश में आया है। मामला उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के एक गांव का है। शादी करने वाले बुजुर्ग पिता की दस संतानों में सात जीवित हैं। हरदोई के बेनीगंज थाने के बक्सापुर गांव की दो बहुए उषा वर्मा समाजवादी पार्टी की सांसद और राजेश्वरी देवी विधायक हैं। इस गांव के रहने वाले दलित बिरादरी के रामौतार ने करीब बीस साल पूर्व अपने बडे़ भाई की साली को गरीबी के कारण विवाह नहीं कर पाने के कारण अपने साथ रख लिया था तब से दोनों एक साथ पति-पत्नी के रूप में रहते थे और दोनों के दस बच्चे भी हुए जिनमें से सात जीवित हैं। एक पुत्र सबसे बड़ा और बाकी छह बेटियां हैं। दोनों इतने साल एक साथ पति

विकलांग लड़की की पत्थर से शादी !

फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)।। इस वैज्ञानिक युग में भी समाज को अंधविश्वास की जकड़न से छुटकारा नहीं मिल पाया है। समाज को झकझोर देने वाला अंधविश्वास का नया मामला उत्तर प्रदेश में फतेहपुर जनपद के एक गांव का है, जहां एक पिता अपनी विकलांग बेटी की शादी पत्थर से तय कर निमंत्रण पत्र भी बांट चुका है। शादी की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं और गांव के देवी मंदिर में इसके लिए अनुष्ठान भी शुरू हो चुका है। फतेहपुर जिले के जाफरगंज थाने के परसादपुर गांव की गौरा देवी मंदिर में यज्ञ और कर्मयोगी श्रीकृष्ण की रासलीला का मंचन किया जा रहा है। इसी यज्ञ के पंडाल में एक अप्रैल को गांव के बालगोविंद त्रिपाठी मानसिक एवं शारीरिक रूप से कमजोर अपनी बेटी की शादी मंदिर के एक पत्थर के साथ हिंदू रीति-रिवाज से रचाएंगे। इसके लिए उन्होंने बाकायदा निमंत्रण पत्र छपवा कर इलाके के गणमान्य व अपने रिश्तेदारों में बांटा भी गया है। हैरानी की बात यह है कि निमंत्रण पत्रों में सभी वैवाहिक कार्यक्रम उत्तर प्रदेश के लखनऊ सचिवालय में तैनात एक कर्मचारी राजेश शुक्ल द्वारा सम्पन्न कराए जाने का जिक्र है। त्रिपाठी का कहना ह

जानिए सफलता का अटल विधान

हाई स्कूल पास करते ही हमने पूरी जागरूकता के साथ फ़ैसला कर लिया था कि हम नेकी और ईमानदारी के साथ अपनी ज़िंदगी गुज़ारेंगे। बचपन से भी हम यही करते आए थे लेकिन वह एक आदत थी जो मां बाप को और घर के दूसरे लोगों को देखकर ख़ुद ही पड़ गई थी। अब अपनी राह ख़ुद चुननी थी और उस राह के अच्छे बुरे अंजाम को भी ख़ुद ही भोगना था। नौजवानी की उम्र एक ऐसा पड़ाव है, जहां संभावनाओं से भरा हुआ इंसान होता है और उसके सामने हज़ारों रास्ते होते हैं। वह उनमें से किस रास्ते पर चलता है, इसका फ़ैसला भी ख़ुद उसी को करना होता है। इस उम्र में इंसान के दिल में हज़ारों सपने और हज़ारों ख्वाहिशें होती हैं। इसी के साथ उसकी और उसके परिवार की कुछ ज़रूरतें भी होती हैं और उन्हें पूरी करने की उम्मीदें भी उससे जुड़ी होती हैं। आर्थिक ज़रूरत इनमें सबसे अहम ज़रूरत है। इसे कोई भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। हम बी. एससी. (बायो.) में आए तो हम भी इसे नज़रअंदाज़ न कर सके। अख़बारों को पढ़कर हमें लगा कि बिना रिश्वत दिए कहीं नौकरी लगेगी नहीं और रिश्वत हम देंगे नहीं। वह हमारे उसूल के खि़लाफ़ था। सो सरकारी नौकरी का ऑप्शन तो बंद ही था। मेडिकल की जो लाइन हमने चुनी थी

भगवान से बेटे की मौत मांगती मां की ममता

एसपी रावत।। कुरुक्षेत्र।। आज के युग में बेटे-बेटियां अपने बूढे मां बाप को सहारा देने से कतराते हैं, लेकिन एक ऐसी बेसहारा मां भी है जो अपने अपाहिज बेटे का पिछले 45 साल से लालन पालन करने में लगी है। मगर अब खुद उसे अपनी जिंदगी पर भरोसा नहीं रहा तो वह उसके लिए अपने से पहले मौत मांग रही है। इस मार्मिक मामले में एक पहलू यह भी है कि इतने वर्षों के अंतराल में रेडक्रॉस विभाग, किसी मंत्री, किसी सांसद, किसी विधायक, किसी अधिकारी तक ने इस मां बेटे की मदद नहीं की। यमुनानगर जिला की रादौर उपतहसील के गांव सढूरा में 45 सालों से चारपाई पर जिंदगी बिता रहे एक अपाहिज बेटे को उसकी विधवा मां पाल रही है। अपाहिज बेटे को खाना खिलाने, नहलाने और शौच करवाने तक का कार्य करते हुए विधवा मां को 45 साल बीत चुके है। इस दौरान उसके बेटे का शिशुकाल, बचपन और जवानी चारपाई पर ही गुजरी है। अब विधवा मां 65 साल से अधिक की हो चुकी है। उसे लगता है कि उसके मरने के बाद उसके चारपाई पर पड़े अपाहिज बेटे को कौन सहारा देगा। इस बात को सोच कर एक विधवा मां अपनी मौत से पहले भगवान से अपने बेटे की मौत मांगने लगी है। गांव स

बच्चों का पालन-पोषण

अगर हमें अपने बच्चों का पालन-पोषण करना है ताकि वे हमारी तरह विकृत न हों... जिज्ञासुः अगर हमें अपने बच्चों का पालन-पोषण करना है ताकि वे हमारी तरह विकृत न हों और बिगडे न, और समाज के गलत लोगों के प्रभाव में न आएँ, तो उनके लिए हमें किस तरह का परिवेश बनाना चाहिए? सद्गुरु - अगर तुम्हें इतनी बात समझ में आ गई है कि तुम्हारा जीवन विकृत है, तो पहला काम जो करना है, वह है कि अपने बच्चों को हाथ मत लगाओ, अपने विकृत मन से उसके मन को प्रभावित मत करो। तुम्हें यही पहला कदम उठाने की जरूरत है। अब यह प्रश्न हैः “मुझे क्या करना चाहिए? मेरे बच्चे की शिक्षा कैसी होनी चाहिए? मुझे उसका पालन-पोषण कैसे करना चाहिए? मुझे उसका मार्ग-दर्शन कैसे करना चाहिए?” तुम उसे बस बुद्धिमान होने के लिए, जागरूक होने के लिए प्रोत्साहित करो। हर प्राणी को अपने जीवन की पूर्ति के लिए आवश्यक बुद्धि दिया गया है। एक चींटी पैदा होती है, तुम उसे देखो और अध्ययन करो। एक चींटी के जीवन को पूर्णता में जीने के लिए उसके पास सभी ज्ञान है। यह वह करने लायक नहीं हो सकती जो तुम कर रहे हो, लेकिन एक चींटी के रूप म

डैड ने दिया तीन बच्चों को जन्म First Male Mother

जानकर चौंक जाएंगे कि तीन बच्चों के पिता 38 साल के थॉमस ने ही तीनों बच्चों को अपने गर्भ से जन्म दिया। वैसे तो यह माना जाता है कि पूरी दुनिया में 5 मेल मदर हैं, लेकिन कैमरे के सामने प्रेग्नेंसी से लेकर जन्म तक आने वाले थॉमस पहले मेल मदर हैं। दरअसल, अमेरिका में फीनिक्स के थॉमस का जन्म लड़की के रूप में हुआ था, लेकिन 20 साल की उम्र में उन्होंने अपना सेक्स चेंज करा लिया और लड़का बन गए। एक दिन मां बनने की इच्छा की वजह से उन्होंने फीमेल रिप्रडक्टिव ऑर्गन्स को हटवाया नहीं और इसी वजह से जेनेटिकली वह मां बन सके। थॉमसे ने सेक्स चेंज कराने के बाद नैंसी से शादी की और एक अननोन स्पर्म डोनर की हेल्प से तीन बच्चों सुजैन, जेनसेन और ऑस्टिन को जन्म दिया। ऑस्टिन को जानवरों से बहुत प्यार है और वह अक्सर अपने डैड के घुटनों पर बैठकर उनकी कहानियां सुनती रहती है। थॉमस उसे यह भी बताते हैं कि वह इस दुनिया में कैसे आई। वह अपनी प्रेग्नेंसी की फोटो भी दिखाकर उसे बताते हैं कि वह किस तरह अपने डैड के पेट में थी। उसे यह रहस्य समझाने के लिए वह समुद्री घोड़े की भी कहानी सुनाते हैं कि वह किस तरह प्रेग्नेंट हो स

Cyclebeads या मालाचक्र : गर्भ नियोजन का एक लाभप्रद उपाय

05 दिसम्बर 2011 वार्ता| तिरूवनंतपुरम। भारत की बढ़ती आबादी पर काबू पाने के लिए परिवार नियोजन के उपाय के तौर पर साइकिलबीड्स या मालाचक्र विकसित की गयी है जो न केवल बहुत सस्ती है बल्कि उससे किसी तरह के दुष्प्रभाव की कोई गुंजाइश नहीं है। यह उपाय उन लोगों के लिये है जो कण्डोम, गर्भनिरोधक गोली अथवा किसी अन्य प्रकार का गर्भनिरोधक इस्तेमाल करने को उचित नहीं समझते हैं। लेकिन इसमें संयम की बड़ी भूमिका होती है। जार्जटाउन विश्वविद्यालय इंस्टीटयूट द्वारा विकसित यह उपाय स्त्री के मासिक च्रक पर आधारित है और इसकी मदद से वह अनियोजित गर्भधारण पर खुद से ही रोक लगा सकती है। यह मालाचक्र ऐसी महिलाओं के लिए कारगर है जिनका मासिक चक्र 26वें दिन से 32वें दिन तक रहता है। 54 फीसदी दंपत्ति गर्भ निरोधकों का इस्तेमाल करते हैं मालाचक्र रंगीन मोतियों की एक माला होती है जिसमें महिला के मासिक चक्र के दिनों के हिसाब से एक रंगीन मोती पिरोया गया है। इस रंग की मदद से वह यह जान सकती है कि उसके गर्भवती होने की संभावना किस दिन ज्यादा है या कम है। मालाचक्र तकनीक को प्रयोग करने के लिए महिला को रजस्वला होने के