माँ , वह सेतु है, जिस पर चढ़ कर बच्चे विपत्तियों के सागर पार कर जाते हैं औ' माँ उनकी सलामती के लिए ईश्वर से दुआ और सिर्फ दुआ माँगा करती है. माँ वह सीढ़ी है, जिस पर चढ़ कर उसके बच्चे जमीन से आसमां तक चलते चले जाते हैं. ऊपर पहुँच कर उस सीढ़ी को पैर से धकेल कर आगे और आगे बढ़ जाते हैं. नीचे आने की सोचते भी नहीं है. वो तो नीचे ही रहती है क्योंकि अब उसकी जरूरत किसी बच्चे को नहीं है. अपने पैरों पर खड़े हो कर वे औरों के लिए सीढ़ी बनने को तैयार हैं. उन्हें नहीं मालूम या फिर याद नहीं कि वे भी कभी किसी को सीढ़ी बनाकर आसमां छूने निकले थे औ' आसमां छूते ही वे चाँद पर पहुँच गए जमीन से नाता तोड़ कर फिर जमीन पर नहीं आ सकते क्योंकि वो जमीन अब उनको स्वीकार नहीं करेगी. माँ के तिरस्कार की कीमत आज नहीं तो कल हर औलाद भुगतती है. और माँ वो दरिया है जिसके प्यार में ऐसी बातें टिकती ही नहीं है. बेटे की सूरत जब भी देखी आंसुओं से भरी आँखें गले लगाने...
बस एक माँ है जो मुझ से कभी ख़फ़ा नहीं होती