मां-बाप क़फ़स में हंसते थे , गुलशन में जाके रोने लगे परिन्दे अपनी कहानी सुनाके रोने लगे बिछुड़ने वाले अचानक जो बरसों बाद मिले वो मुस्कुराने लगे , मुस्कुराके रोने लगे खुशी मिली तो खुशी में शरीक सबको किया मिले जो ग़म तो अकेले में जाके रोने लगे फिर आई ईद तो अब के बरस भी कुछ मां-बाप गले से अपने खिलौने लगाके रोने लगे - शफ़क़ बिजनौरी , निकट मदीना प्रेस बिजनौर - 246701
बस एक माँ है जो मुझ से कभी ख़फ़ा नहीं होती