Skip to main content

Posts

Showing posts with the label 'मनोरंजन'

नारी को आगे बढ़ने में मदद करते हैं पुरूष भी

जो सच में एक नारी होती है वह कहती है कि उसे आगे बढ ने में उसकी मां ने ही नहीं बल्कि उसके बाप ने भी मदद की है। इक्का दुक्का नासमझ औरत-मर्दों ने कभी कभी इस सच्चाई को झुठलाने की कोशिशें भी की हैं लेकिन सच बहरहाल सच होता है और वह बार बार सामने आता रहता है। यह स्टोरी पढ़ी तो यही सच एक बार फिर हम सबके सामने आ गया है। पेरेंट्स का भरोसा बनाता है बेटियों को कामयाब संदीप द्विवेदी गुड़गांव। बेटियों की कामयाबी की असल वजह पेरेंट्स का भरोसा होता है। आत्मविश्वास से भरी कनुप्रिया कहती हैं कि पेरेंट्स अगर लड़कियों को प्रोत्साहित करें और उन्हें अपने फैसले लेना सिखाएं तो किसी भी समाज की तकदीर बदल सकती है। कनुप्रिया डिडवानिया (अग्रवाल) देश की पहली टेस्ट टय़ूब बेबी हैं। कलकत्ता में जन्मीं कनुप्रिया ने पुणे से मैनेजमेंट की पढ़ाई की और पिछले दस सालों से साइबर सिटी में रह रही हैं। वो एक नामी कन्फेकशनरी कंपनी में ग्रुप प्रोडक्ट मैनेजर के तौर पर काम कर रही हैं। बदलते सामाजिक परिदृश्य में बदलती सोच को सही करार देते हुए कनुप्रिया कहती हैं कि अब लड़कियां शादी के बाद पराई नहीं होती। लड़कों की तुलना में लड़कियों का...

मां का प्यार अनकंडीशनल होता है

विज्ञापन की दुनिया का जाना-माना नाम तो वह हैं ही, प्रसून जोशी की एक पहचान वे फिल्मी गीत भी हैं, जो उन्होंने पिछले कुछ साल में लिखे हैं। वह नई पीढ़ी के गीतकारों की उस पांत का हिस्सा हैं, जिसने हिंदी गीतों को नई ऊंचाई दी। प्रसून ने फिल्मी गीतों में कविता को ठीक उसी तरह प्रतिष्ठित करने का काम किया है, जैसे कभी कवि शैलेंद्र, साहिर लुधियानवी और इंदीवर ने किया था। प्रसून विज्ञापन की दुनिया से फिल्मों में आए हैं, इसलिए बाजार के दबाव और कविता के मर्म, दोनों को बखूबी समझते हैं। पिछले दिनों दीप भट्ट ने उनसे लंबी बात की। प्रस्तुत हैं बातचीत के कुछ अंश : आपने मां पर बहुत गीत लिखे, क्या ये सिर्फ कहानी की मांग पर ही लिखे गए? मेरा मां से बहुत गहरा लगाव है। जब मैंने तारे जमीं पर के लिए मां से जुड़ा गीत लिखा, तो उसमें मां से दूर हॉस्टल में रहने वाले बच्चे के भय और मां से भावनात्मक लगाव को दिखाया। इस पूरे गीत में मेरे भीतर का बच्चा भी मौजूद है। एक दिन जब में मुंबई में ताज होटल से बाहर निकल रहा था, तो एक अस्सी साल का बूढ़ा मुझसे लिपटकर रोने लगा। उसने कहा कि प्रसून मैं अस्सी का हूं और मेरी मा...

वो जाने किस पल सोती है ? No Sleep

एक माँ अपने बच्चे के लिए क्या कुछ और कैसे करती है  ? यही सब जानिये दिगंबर नासवा जी के शब्दों में  माँ .....    मैने तो जब देखा अम्मा आँखें खोले होती है जाने किस पल जगती है वो जाने किस पल सोती है बँटवारे की खट्टी मीठी कड़वी सी कुछ यादें हैं छूटा था जो घर आँगन उस पर बस अटकी साँसें हैं आँखों में मोती है उतरा पर चुपके से रोती है जाने किस पल जगती है वो जाने किस पल सोती है मंदिर वो ना जाती फिर भी घर मंदिर सा लगता है घर का कोना कोना माँ से महका महका रहता है बच्चों के मन में आशा के दीप नये संजोती है जाने किस पल जगती है वो जाने किस पल सोती है चेहरे की झुर्री में अनुभव साफ दिखाई देता है श्वेत धवल केशों में युग संदेश सुनाई देता है इन सब से अंजान वो अब तक ऊन पुरानी धोती है जाने किस पल जगती है वो जाने किस पल सोती है मूल स्रोत : स्वप्न मेरे 

रिश्तों से रिसता दर्द, रविवार डॉट कॉम में सारदा लहांगीर

प्रतीक हेतु चित्र गूगल से साभार, संपादक   मुझे पता है, मेरे दिन अब गिनती के रह गए हैं, मुझे कुछ नहीं चाहिए, मौत आने से पहले कोई मुझे मेरे बेटे से मिलवा दे। यह व्यथा है, एक बेबस मां की, जिसे कैंसर ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है। सुंदरगढ़ जिले के लाहुनीपाड़ा की 32 बरस की नीता को 2008 में जब कैंसर से पीड़ित पाया गया, तब तक यह नासूर उसके शरीर में काफी फैल चुका था और जब उसके पति धनराज को पता चला कि उसका रोग लाइलाज हो गया है, तो उसने नीता को बेसहारा छोड़ दिया। वह अपने साथ अपने बेटे को तो ले गया, लेकिन बेटी को नीता के भरोसे छोड़ दिया। 2008 से नीता अपने बेटे से नहीं मिल सकी है। 2010 में जब उसकी हालत बिगड़ने लगी, तो उसके माता-पिता को खबर की गई, वे आए भी, लेकिन वे कर भी क्या सकते थे। असल में जब डॉक्टरों ने बताया कि नीता की जिंदगी के कुछ महीने ही रह गए हैं, तभी धनराज ने उसे छोड़ दिया। पता चला है कि वह छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में कहीं रह रहा है। नीता उड़ीसा में कैंसर की अकेली मरीज नहीं, जिसे उसके परिवार ने बेबस छोड़ दिया हो। पुरी की 24 बरस की रस्मिता दास की कहानी भी नीता जैसी ही है...

मां के गर्भ में बच्चियों का क़त्ल शिक्षित घरानों में कहीं ज़्यादा

पानीपत (एसएनबी)। जनगणन 2011 ने साबित कर दिया है कि लड़कियों के प्रति हमारा समाज कितना बेरहम है ? तक़रीबन 110 बरस पहले 1901 की जनगणना में भारतीय समाज में लड़कियों जो तादाद थी। उससे बेहतर अभी भी नहीं हुई है। साईंस और तकनीक की तरक्क़ी ने बेरहम मां-बाप के हौसलों को इतना बढ़ा दिया है कि अब वे अपनी बच्चियों को दुनिया में आने से पहले ही मां के पेट में क़त्ल कर देते हैं। ये बातें हाली पानीपती ट्रस्ट के सेक्रेटरी एडवोकेट राम मोहन राय ने पानीपत में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने कहा कि मां के गर्भ में बच्चियों का क़त्ल शिक्षित घरानों में हो रहा है। उन्होंने मेवात की मिसाल देते हुए कहा कि दक्षिणी हरियाणा के इस मुस्लिम बहुल ज़िले में स्त्री-पुरूष के अनुपात में बहुत कम अंतर पाया गया है। इससे साबित होता कि इस पिछड़े ज़िले के लोग बच्चियों का क़त्ल नहीं करते। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों और शेड्यूल्ड कास्ट्स में बच्चियों को मां के गर्भ में मारने का रिवाज नहीं है। ऐसा सिर्फ़ आधुनिकता के प्रभाव में जीने वाले बहुसंख्यक समाज में हो रहा है। उन्होंने संवाददाताओं ने को जानका...