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सुब्हान-अल्लाह, ज़िन्दगी बनाए बेहतर

आयुर्वेदिक और यूनानी प्रोडक्ट्स के होलसेलर सैयद सलीम अहमद साहब हमारे एक अच्छे दोस्त हैं। उनके इसरार पर उनके घर जाना हुआ तो उनके घर के चार बच्चों पर इज्तेमाई (सामूहिक) हाज़िरात की। कभी कभी हम हरेक पर अलग अलग हाज़िरात करने के बजाय कई पर एक साथ भी कर लेेते हैं।
अगले दिन उनकी बेटी ने अपनी टीचर को बताया कि कैसे उसके साथ एक जिन्न (नज़र न आने वाला चेतन जीवधारी) लग गया था, जब वह उनके साथ मन्दिर के गेट तक गई थी!
सलीम भाई की बेटी ने हमारी तारीफ़ में दो चार बातें मज़ीद ऐसी कह दीं कि उनकी टीचर ने फ़ोन करके हमसे मुलाक़ात का टाईम मांगा। बालीं-‘मैं किस वक्त और किसके साथ आऊँ?
हमने कहा -‘आप अपनी सहूलत के वक्त अपनी मां या अपने दादा दादी वग़ैरह किसी के साथ आ सकती हैं।’
उन्होंने कहा -’अपने दादा से तो मैं बोलती तक नहीं। मैं अपनी मम्मी के साथ आ जाऊँगी।’
दादा से न बोलने की बात उनके जीवन में नकारात्मकता का पता दे रही थी। नकारात्मकता इंसान को कमज़ोर बनाती है और फिर वह कई तरह के हमलों का आसान शिकार बनकर रह जाता है।
उससे अगले दिन 21 मार्च 2014 को वह अपनी मां और सलीम भाई की बेटी को साथ लेकर हमारे ग़रीबख़ाने पर तशरीफ़ ले आईं।
‘मेरा नाम भावना है।’-उन्होंने बनियों के एक गोत्र के साथ अपना पूरा नाम बताया।
‘जी, मुझे मालूम है।’-हमने जवाब दिया।
भावना लगभग साढ़े पांच फ़ुट लम्बी बहुत साफ़ रंग की मालिका थीं। उन्होंने लेडीज़ स्टायल की पैन्ट शर्ट पहन रखी थी। उनके बाल भी स्टायल में कटे हुए थे जो उनके कंधों पर पड़े थे। उनकी मां का लिबास परम्परागत था लेकिन बाल उनके भी कटे हुए थे। सलीम भाई की बेटी दुपट्टे से सिर ढके बैठी थी।
‘आप बनिये के बजाय पंजाबी लगती हैैैं।’-हमने हंसते हुए भावना और उनकी मां से कहा।
‘हां, लोग हमें देखकर पंजाबी ही समझते हैं। हमने अपने बच्चों को ऐसे ही पाला है।’-भावना की मम्मी ने जवाब दिया।
‘क्या आप पंजाबियों के मुहल्ले में रहते हैं?’
‘नहीं, हम पंजाबियों के मुहल्ले में नहीं रहते।’
हमने मक़सद की अहम बात करने से पहले उनसे हल्की फुल्की बात की ताकि वे रिलैक्स हो जाएं और हमें भी अपनी ही तरह का एक आम आदमी समझें। इससे आदमी अपनी बात खुलकर कह पाता है और किसी की समस्या को समझने के लिए उसके मन की अंदरूनी पर्तों की जानकारी बहुत ज़रूरी है।
भावना अपनी समस्या का कारण जानने की जल्दी में थी। उसने पूछा-‘अंकल, यह बताईये कि कौन मेरे पीछे पड़ा है?’
‘मैं तो आपके पीछे बिल्कुल नहीं पड़ा हूं।’-मैं उसकी बात को हल्के से मज़ाक़ में बदल दिया। वे तीनों हंस पड़े।
तब तक चाय नाश्ता भी आ गया। हम यही चाहते थे। भावना ने चाय के दौरान बातचीत में बताया कि उसके पापा की मौत हो चुकी है। वही अकेली घर चला रही है। उसके एक बहन है जिसकी शादी हो चुकी है और एक भाई है जो कि जॉब की तलाश कर रहा है। वह एक इंटरनेशनल इंग्लिश मीडियम स्कूल में टीचर हैं लेकिन उन्हें पढ़ाने के लिए उनका मनपसंद सब्जेक्ट नहीं दिया गया है। उनके पास पहले के मुक़ाबले ट्यूशन भी बहुत कम हो गए हैं। उम्र लगभग 27 साल हो चुकी थी लेकिन उनकी शादी भी नहीं हो पाई थी।
‘आखि़र मेरे सामने ये सारी परेशानियां क्यों आ रही हैं?’-हीरा, मूंगा और पन्ना की अंगूठियाँ पहनकर मेरे सामने बैठी भावना ने पूछा।
‘धन और ख़ुशियां लाने वाले सारे गैजेट्स तो आपने पहले ही पहन रखे हैं। फिर भी आपके जीवन में सफलता और ख़ुशियां नहीं हैं तो आप सोचिए कि ऐसा क्यों हो रहा है?’-हमने कहा।
‘भाई साहब! अब तो इसने कम पहन रखी हैं वर्ना तो यह दस की दस उंगलियों में अंगूठियां पहनती थी।’-भावना की मम्मी ने बताया।
‘अंकल! आप बताईये, क्या कारण है?’-भावना ने अपने दिमाग़ पर कोई ज़ोर डाले बिना ही फिर से सवाल कर दिया।
‘आपके अंदर नकारात्मकता है। आपके अंदर नाशुक्री है। जिस गॉड ने आपको पैदा किया और इतना अच्छा रंग और अच्छा क़द दिया। आपने कभी उसका शुक्र अदा नहीं किया।’-हमने उन्हें यह जानते हुए भी बताया कि वह मानेंगी नहीं। कोई भी आदमी यह नहीं मानना चाहता कि वह अपने क्रिएटर का नाशुक्रा है। हरेक आदमी ख़ुद को अच्छे गुणों से भरपूर मानता है। वह चाहता है कि उसकी नाकामियों और उसकी परेशानियों की ज़िम्मेदारी दूसरों पर डाल दी जाए कि उस आदमी ने साज़िश कर दी या उस आदमी ने जादू कर दिया। भावना भी कुछ ऐसा ही सुनना चाहती थीं। हमारी बात से उन्हें झटका लगा।
‘नहीं अंकल, मैं गॉड का तो बहुत शुक्र अदा करती हूं।’-भावना जी ने कहा।
‘अच्छा, अगर ऐसा है तो आप गॉड का नाम बताईये।’-हमने उनसे सवाल कर दिया। इस सवाल पर वह चकरा गईं।
‘गॉड का नाम तो पता नहीं है।’-उन्होंने शर्मिन्दगी के साथ क़ुबूल किया।
‘आपको अपने पैदा करने वाले गॉड का नाम तक मालूम नहीं है तो फिर आपने उसका शुक्र कैसे अदा कर दिया?’-हमने कहा। उन्हें चुप रह जाना पड़ा।
‘जिस मालिक ने आपको इतना ख़ूबसूरत जीवन दिया। आपने उसका शुक्र अदा नहीं किया लेकिन शिकवे पाल लिए। यह सोचने का ग़लत पैटर्न है। शिकवे-शिकायत का मतलब है कि आपकी सोच जीवन के अभाव पर कन्सन्ट्रेट है। यह सोच आपके जीवन में और ज़्यादा अभाव लेकर आती रहेगी। इसके बजाय आप यह देखें कि उस रब ने आपको कितना कुछ दिया है। इससे आपके अंदर शुक्र का जज़्बा पैदा होगा और इसके बाद आपके पास हर वह चीज़ बहुत कम कोशिश से आने लगेगी जिसकी तुम्हें ज़रूरत होगी।’-हमने उन्हें समझाया।
‘आपने तो इनसे कहा था कि कोई मेरे पीछे भी पड़ा है।’-भावना जी ने सलीम भाई की बेटी की तरफ़ इशारा करते हुए पूछा।
‘हां, यह सच है।’-हमने कहा।
‘मतलब...?’
‘मतलब यह कि आप पर कुछ ऐसा असर भी है जिसे पुराने लोग नज़र और जादू कहते हैं और आजकल के एजुकेटिड लोग जो इन नामों से चिढ़ते हैं वे इन्हें ‘सायकिक अटैक’ कहते हैं।’-हमने उन्हें खोलकर बताया।
‘इसके पीछे कौन है?’-हमने कहा कि यह सब हम नहीं बताएंगे बल्कि आप ख़ुद देख लेंगी, ...लेकिन इसके लिए हम आपको कोई तावीज़ वग़ैरह देने वाले नहीं हैं बल्कि आपको आपको अपने सोचने का पैटर्न बदलना पड़ेगा।’-हमने कहा।
‘अंकल! आप मुझे तावीज़ ज़रूर दीजिएगा।’-भावना जी ने कहा।
‘आप ज़िद करेंगी तो हम आपको तावीज़ दे देंगे लेकिन तब काम होने की कोई गारंटी नहीं है।’-हमने कहा।
वह ख़ामोश रहीं। फिर बोलीं-‘अच्छा मुझे क्या करना होगा?’
‘आपको सबसे पहले अपने गॉड से, ईश्वर से, जिसने आपको पैदा किया है, उससे माफ़ी मांगनी होगी कि उसने आपको जीवन दिया और बड़े बड़े अहसान किये लेकिन आपने कभी उसका शुक्र अदा नहीं किया। रात को जब आप सोने के लिए बिस्तर पर लेटें, तब आप 2 मिनट तक उससे माफ़ी मांगे और फिर आप कुछ देर तक उस ईश्वर की पवित्रता का ध्यान करें और ‘सुब्हान-अल्लाह’ कहती रहें। आप ईश्वर को जिस गुण के साथ याद करेंगी, वह आपके जीवन में भी आ जाएगा। आपके जीवन में पवित्रता आएगी तो आपका मन हल्का हो जाएगा। जिसका असर आप अपने तन पर भी महसूस करेंगी और फिर आप उसका असर अपने जीवन में भी देखेंगी। आपका हरेक कष्ट आपसे ख़ुद ही रूख़सत हो जाएगा।
क़ुरआन में हज़रत यूनुस अलैहिस्-सलाम के कष्ट दूर होने की वजह उनका तस्बीह (पवित्रता का बयान) करना बताया गया है। आपकी आंख रात में खुल जाए तो भी आप तस्बीह करें और सुबह को उठकर भी पहला काम यही करें और दिन में भी थोड़े थोड़े समय बाद ‘सुब्हान-अल्लाह’ कहती रहें। आप 40 दिन तक ऐसा करती रहें। इससे ईश्वर की पवित्रता का विश्वास आपके मन में गहराई तक बैठ जाएगा। तब आपके सोचने का पैटर्न बदल चुका होगा। आपकी सफलता की कुंजी आपके अंदर ही है। सबकुछ इनबिल्ट है। आपको अपनी चीज़ों से काम लेना सीखना होगा। इनमें सबसे बड़ी चीज़ आपकी सोच है। आपकी सोच आपके जीवन को प्रभावित करती है। आज आप जो कुछ हैं, वह आपकी पिछले दिनों की सोच और मेहनत का नतीजा है। अब आप जो सोचेंगी, उसका नतीजा आपको आने वाले दिनों में दिख जाएगा। पुरानी भावना की जगह एक नई भावना सामने आती चली जाएगी और आपको अहसास तक नहीं होगा।’
‘मेरे ऊपर अटैक के पीछे कौन हैं।’
‘क्या ज़रूरत है यह जानने की?’
‘अपने बचाव के लिए।’
‘ठीक है, आप ख़ुद ही देख लेंगी।’-हमने कहा। हमारे बच्चे वहां ज़रूरत की वजह से आ जा रहे थे। हमने अपने बड़े बेटे को पास बैठा लिया। व्यक्ति विचार है। विचार ज़िन्दा है तो व्यक्ति भी ज़िन्दा है। जो विचार अब हमें अपने उपयोग में ले रहा है, उसे हमारे बाद हमारे बेटे के दिल में होना है, इस तरह शरीर बदलेगा लेकिन मन की भावना नहीं। हमें अपने बच्चों को ज़िन्दगी और मौत की हक़ीक़त और इनसे काम लेने का तरीक़ा बहुत बारीकी से सिखाने की ज़रूरत है।
‘मेरी बहन के पति विदेश जाने की कोशिश कर रहे हैं। क्या वह जा पाएंगे?’-भावना ने पूछा।
‘ठीक है, यह हम देखकर बता देंगे, ज़रा चाय पी लें।’-हमने सिप लेते हुए कहा और फिर सोचा कि यह तो हमारे बेटे भी देख लेंगे। हमने चाय पीते हुए ही अपने बेटे से कहा कि ज़रा देखकर बताना। बेटे साहब मुराक़बा (ध्यान) के माहिर हैं। वह नमाज़ में सज्दे ज़रा लम्बे करते हैं। उन्होंने आंखें बन्द करके सवाल पर ध्यान किया और दो मिनट से भी कम वक्त में उन्होंने लैन्ड करता हुआ हवाई जहाज़ देखकर कहा कि हां, विदेश जाने के काम में कामयाबी पक्की है।
‘मेरे भाई की जॉब का क्या होगा?’
‘वह भी लग जाएगी। आपका हर काम बनता चला जाएगा। जो ईश्वर सारी गैलेक्सीज़ को संभाले हुए है, वही आपके सारे काम करता आया है और करता रहता है। आप उस पर भरोसा करें। ज़िन्दगी के तल्ख़ तजुर्बों को याद न करें। किसी ने आपको सताया हो तो भी यह राय न बनाएं कि यह दुनिया बड़ी ज़ालिम है और लोग बड़े ख़ुदग़र्ज़ हैं। ऐसे लोगों के लिए भी आप भलाई की दुआ करें और जो नेमतें आपके पास हैं, आप उनके बारे में सोचें, उनके बारे में उस मालिक का शुक्र अदा करें।
आपको जुगाड़ का जीवन साथी नहीं बल्कि आपके मन का मीत, सोल-मेट मिलेगा। आपको जैसा जीवनसाथी चाहिए। उसके रूप-रंग, एजुकेशन, आमदनी और शहर के बारे में बिल्कुल साफ़ साफ़ सोचिए और फिर उसे एक काग़ज़ पर लिख लीजिए। उसके बाद आप उस रब से दुआ कीजिए। बिल्कुल वही जीवनसाथी आपको मिल जाएगा। वह विदेश में हुआ तो भी मालिक उसे आपके पास ले आएगा। वह बिना किसी दहेज के आपको अपनाएगा।
जो लोग कन्फ़्यूज़ होते हैं और दहेज देने की तैयारी किए रखते हैं। उन्हें लालची लोग ही मिलते हैं और वे उनके साथ कैसा भी सुलूक करते रहते हैं। आपका शक, आपका डर और आपकी चिंताएं आपका भला नहीं करतीं बल्कि आपको बर्बाद करती रहती हैं।’
विदा होने से पहले उन्होंने सलीम भाई की बेटी को कुछ नोट देकर हमसे जानना चाहा कि क्या हम कुछ रूपये लेना चाहेंगे?
हमने कहा कि हम लेते नहीं हैं बल्कि देते हैं। बहरहाल वे तीनों रूख़सत हो गए और अगले ही दिन भावना ने फ़ोन करके बताया कि उनकी मम्मी ने हमारे बताए तरीक़े से ज़िक्र किया और फिर सो गईं तो उन्होंने सपने में एक बहुत ऊँचा पहाड़ देखा जो कि आकाश को छू रहा था।
हमने कहा कि यह आपकी सफलता है, जो आपकी मम्मी ने देखी है।
भावना ने बताया कि मैंने तीन लोगों को एक काला कपड़ा लेकर अपनी तरफ़ आते हुए देखा।
हमने कहा कि ये आपके दुश्मन हैं।
भावना ने कहा कि लेकिन ये लोग हैं कौन?
हमने कहा कि आपको तरीक़ा बता दिया है। आप उसे करती रहें। हर चीज़ आप पर ख़ुद ही खुल जाएगी।
भावना ने यह भी बताया कि अब वह बहुत हल्का महसूस कर रही है।
यह उनका मन था। यह हमने उन्हें नहीं बताया।
भावना ने बताया कि एक टीचर जो उनकी कम्पिटिटर है, उस पर आज डाँट भी पड़ी है। एक दिन में इतना सब, यह एक बड़ी कामयाबी थी।
उसके एक दिन बाद भावना का फ़ोन फिर आया। उन्होंने बताया कि आज उन्हें सपने उनकी सबसे ख़ास सहेली नज़र आई जो उनके साथ ही टीचर है। उसने कहा कि तेरी दुश्मन कोई और नहीं बल्कि मैं हूँ।
मुझे आज तक किसी ने कुछ नहीं कहा। सबके बारे में यही टीचर मुझे इन्फ़ॉर्म करती आयी हैं। क्या मैं इस सपने पर यक़ीन कर लूं?
हमने कहा कि अभी आप सिर्फ़ एहतियात बरतें। हर चीज़ आप धीरे धीरे खुलती चली जाएगी।
भावना ने बताया कि वह ख़ुद को अब और ज़्यादा हल्का महसूस कर रही हैं। उन्होंने अपनी मम्मी के बारे में भी पूछा कि वह श्रीकृष्ण जी का कीर्तन करती आई हैं। अब आपने प्रार्थना का यह तरीक़ा बता दिया है। उनके लिए बड़ी मुश्किल हो गई है। वह क्या करें?
हमने कहा कि हम भी श्री कृष्ण जी को और श्री रामचन्द्र जी को मानते हैं। हम पक्के मनुवादी हैं।
भावना को यक़ीन नहीं हुआ। उन्होंने ताज्जुब से पूछा कि क्या आप इन्हें मानते हैं?
हमने कहा कि हां, ये हमारे पूर्वज थे। हम इनका आदर करते हैं। हम इन्हें महापुरूष मानते हैं लेकिन इन्हें ईश्वर नहीं मानते। महापुरूषों को महापुरूष मानना चाहिए और ईश्वर को ईश्वर। आप भी ऐसे ही मानिए। कीर्तन से प्रॉब्लम नहीं है लेकिन कीर्तन में कुछ ऐसी बातें कह दी जाती हैं जो न तो श्रीकृष्ण जी की शान के लायक़ हैं और न ही ईश्वर के। ऐसे कीर्तन से ज़रूर परहेज़ करना चाहिए और प्रार्थना एक ईश्वर के सिवा किसी और से हरगिज़ हरगिज़ नहीं करनी चाहिए। बहुतों से प्रार्थना करना एक ईश्वर की भक्ति और अनन्य निष्ठा के खि़लाफ़ है। एक ईश्वर से मांगने के बाद किसी और से मांगने की ज़रूरत ही शेष नहीं रह जाती। महापुरूष को ईश्वर और ईश्वर को महापुरूष समझ लेना अज्ञान है।
भावना ने कहा कि हमारी मम्मी केवल कीर्तन करती हैं लेकिन श्री कृष्ण जी से प्रार्थना नहीं करतीं।
इसका मतलब यह हुआ कि भावना को न कीर्तन के बारे में पता है और न उसमें कही जा रही बातों के बारे में। यह उनकी मम्मी के लिए केवल एक सामाजिक सांस्कृतिक परम्परा मात्र है। हर तरफ़ लोग बहुत कुछ कर रहे हैं लेकिन वे उनके मक़सद और सही तरीक़े को जाने बिना ही कर रहे हैं। जिसकी वजह से धार्मिक परम्पराओं का रूप विकृत हो जाता है। ऐसे लोगों की आज बहुत बड़ी तादाद है और आज यही लोग धार्मिक कहलाते हैं।
अधिकतर लोगों को सही-ग़लत और ज़िन्दगी के मक़सद से सरोकार कम है। उन्हें अपनी समस्याओं का हल और फ़ायदा दरकार है।
इस एंगल से भी धर्म और प्रार्थना फ़ायदेमन्द है। इससे हमें मन की शान्ति और एकाग्रता मिलती है। जीवन में शान्ति और एकाग्रता हो तो हम अपनी क़ाबिलियत का ज़्यादा अच्छा इस्तेमाल कर पाते हैं। यह एक जानी मानी हक़ीक़त है।
आत्म-विकास के लिए शान्ति एक बुनियादी ज़रूरत है। यह सुब्हान-अल्लाह कहने और उसके भाव को मन में समा लेने से सहज ही मिल जाती है।
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Special note: यह पब्लिश होने के बाद अभी अभी यानि 5:30 बजे शाम भावना जी ने फ़ोन करके बताया है कि उनके भाई की जॉब लग गयी है और उनके स्कूल में एक नया सेक्शन खुलने की शुरुआत हो गयी है जिसमें हो सकता है कि वही सब्जेक्ट पढ़ाया जाये जोकि वह पढ़ाना चाहती हैं.

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