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"माँ ममता और बचपन"

माँ की ममता एक बच्चे के जीवन की अमूल्य धरोहर होती है । माँ की ममता वो नींव का पत्थर होती है जिस पर एक बच्चे के भविष्य की ईमारत खड़ी होती है । बच्चे की ज़िन्दगी का पहला अहसास ही माँ की ममता होती है । उसका माँ से सिर्फ़ जनम का ही नही सांसों का नाता होता है । पहली साँस वो माँ की कोख में जब लेता है तभी से उसके जीवन की डोर माँ से बंध जाती है । माँ बच्चे के जीवन के संपूर्ण वि़कास का केन्द्र बिन्दु होती है । जीजाबाई जैसी माएँ ही देश को शिवाजी जैसे सपूत देती हैं । जैसे बच्चा एक अमूल्य निधि होता है वैसे ही माँ बच्चे के लिए प्यार की , सुख की वो छाँव होती है जिसके तले बच्चा ख़ुद को सुरक्षित महसूस करता है । सारे जहान के दुःख तकलीफ एक पल में काफूर हो जाते हैं जैसे ही बच्चा माँ की गोद में सिर रखता है ।माँ भगवान का बनाया वो तोहफा है जिसे बनाकर वो ख़ुद उस ममत्व को पाने के लिए स्वयं बच्चा बनकर पृथ्वी पर अवतरित होता है । एक बच्चे के लिए माँ और उसकी ममता का उसके जीवन में बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान होता है । मगर हर बच्चे को माँ या उसकी ममता नसीब नही हो पाती । कुछ बच्चे जिनके सिर से माँ का...

खुदा का नूर ''माँ''

बड़े तूफ़ान में फंसकर भी मैं बच जाती हूँ ; दुआएं माँ की मेरे साथ साथ चलती हैं . ******************************* तमाम जिन्दगी उसकी ही तो अमानत है  ; सुबह होती है उसके साथ ;शाम ढलती है . ******************************* खुदा का नूर है वो रौशनी है आँखों की ; शमां बनकर वो दिल के दिए में जलती है  ************************************ नहीं वजूद किसी का कभी उससे अलग ; उसकी ही कोख में ये कायनात पलती है . *********************************** उसके साये में गम के ओले नहीं आ सकते ; दूर उससे हो तो ये बात बहुत खलती है . ********************************** मेरे लबो पे सदा माँ ही माँ  रहता है ; इसी के  डर से  बला अपने आप टलती है . **********************************   http://shikhakaush...

गुटुक !

ये बनाया मैंने बांहों का घेरा दुआओं का घेरा खिलखिलाती नदियों की कलकल का घेरा मींच ली हैं मैंने अपनी आँखें कुछ नहीं दिख रहा कौन आया कौन आया अले ये तो मेली ज़िन्दगी है ... ये है रोटी , ये है दाल ये है सब्जी और मुर्गे की टांग साथ में मस्त गाजर का हलवा बन गया कौर मींच ली हैं आँखें कौन खाया कौन खाया बोलो बोलो नहीं आई हँसी तो करते हैं अट्टा पट्टा हाथ बढ़ाओ ..... ये रही गुदगुदी कौन हंसा कौन हंसा बोलो बोलो बोलो बोलो जल्दी बोलो मींच ली हैं आँखें मैंने गले लग जाओ मेरे और ये कौर हुआ - गुटुक !

आँचल

प्रेम से युक्त है वह आँचल,  स्नेह से संयुक्त है वह आँचल,    ममता का आगार है वह आँचल,     प्यार का भंडार है वह आँचल,   सुख में प्यार छलकाता है वह आँचल,  दुःख में गले लगाता है वह आँचल, सब पर प्यार लुटाता है वह आँचल,   सबको पास बुलाता है वह आँचल,    शक्ति से परिपूर्ण है वह आँचल,      धेर्य से सम्पूर्ण है वह आँचल,    और नहीं कोई ,वह है  , "माँ का आँचल"

क्या लिखूं?

मम्मी के लिए कुछ मुक्कमल लिखना नामुमकिन है... कहीं न कहीं कोई न कोई कमी रह ही जाएगी... कुछ कहने की कोशिश करूँ भी तो कहाँ से शुरू करूँ और कहाँ ख़त्म, यह नहीं पता... शुरुआत कुछ सवालों से कर रही हूँ.... उसी से पूछ कर... तुम्हारे बारे में क्या लिखूं? तुम्हारी डांट या मोहब्बत लिखूं? वो मार लिखूं जो अब तक राह दिखाती है, या मार के बाद रोते हुए गले लगाने की आदत लिखूं? बच्चों के साथ तुम्हारा प्यार लिखूं, या बुजुर्गों की खिदमत लिखूं? अरहर की दाल हो या पौधीने की चटनी, या फिर ज़िन्दगी में तुमसे बढती लज्ज़त लिखूं? बरकतों की पोटली लिखूं, या कुदरत की इनायत लिखूं? तुम्हारी सादगी लिखूं, या उस सादगी में छिपी तुम्हारी ताकत लिखूं? चालीस साल के हमसफ़र के जाने का ग़म लिखूं या उसके चले जाने के बाद तुम्हारी हिम्मत लिखूं? बेदाग़ आँचल सी उम्र लिखूं, या ज़िन्दगी भर की इबादत लिखूं? आई लिखूं, मम्मी लिखूं, प्यारी माँ लिखूं, या बस खुदा की सूरत लिखूं?  ...............

बोलो माँ,बोलो !!!

माँ,अब क्या करोगी? कैसे लौटाओगी मुझे उन रास्तों पर, जो मेरे नहीं थे........ तुम भ्रम का विश्वास देती रही, जिसे मैं सच्चाई से जीती गई... जब भी ठेस लगी, तुमने कहा-'जाने दो, जो हुआ -यूँ ही हुआ' ये 'यूँ ही' मेरे साथ क्यों होता है! तुमने जिन रिश्तों की अहमियत बताई, उन्होंने मुझे कुछ नहीं माना...... मैं तो एक साधन- मात्र थी माँ कर्तव्यों की रास से छूटकर जब भी अधिकार चाहा खाली हाथ रह गई.... फिर भी, तुम सपने सजाती गई, और मैं खुश होती गई.......... पर झूठे सपने नहीं ठहरते चीख बनकर गले में अवरुद्ध हो जाते हें और कभी बूँद-बूँद आंखों से बह जाते हें! इतनी चीखें अन्दर दबकर रह गईं कि, दिल भर गया इतने आंसू -कि, उसका मूल्य अर्थहीन हो गया........ माँ, ज़माना बदल गया है, जो हँसते थे तुम्हारे सपनों पर वे उन्हीं सपनों को लेकर चलने लगे हें पर कुछ इस तरह, मानों सपने सिर्फ़ उनके लिए बने थे......... माँ, मैंने तुमसे बहुत प्यार किया है, और माँ, मैं इस प्यार में जीती हूँ पर माँ, मैं तुम्हारे झूठे भ्रम को अब अपनी पलकों में नहीं सजा पाउंगी, तुम जो जोड़ने का सूत्र उठाती हो उसे छूने का दिल नहीं होता.....

माँ कुछ नहीं होती

माँ कुछ नहीं होती  कहते हैं सब  माँ वो होती है जो बच्चे की  पहली गुरु होती है कौन मानता है  कौन समझता है माँ तो सिर्फ  जरूरत पर  प्रयोग की जाने वाली वस्तु होती है जिसकी भावनाओं से  खेला जा सके अपने आंसुओं से जिसे पिघलाया जा सके जिसे रोज ये पाठ  याद कराया जाए माँ तो त्याग  और स्नेह  की प्रतिमूर्ति होती है और वो इसी भंवरजाल में उम्र भर उलझी रहे कहते हैं सब  माँ वो होती है  जो भगवान से भी बढ़कर होती है मगर कहाँ होती है अभी जाना किसी ने जब माँ को घर से निकाल चौराहे पर खड़ा कर देते हैं  तब भगवान का कौन सा  रूप होती है वो    माँ तो सिर्फ  वक्ती जरूरत होती है जब तक हड्डियाँ  चलती रहती हैं तभी तक कुछ  क़द्र होती है उसके बाद तो  माँ सिर्फ एक  घर के कोने में पड़ा गैर जरूरी सामान होती है  जो जगह घेरे होती है वो कहते हैं  माँ घर की शान होती है कहाँ होती है ? कब होती है ? शायद तभी तक  जब तक समाज से  बच्चे की गलती पर भी  लड़ जाती है पर  उस पर न आंच आने देती है  ह...