माँ बाप की अहमियत और फ़ज़ीलत

  • Monday, May 12, 2014
  • by
  • DR. ANWER JAMAL
  • मदर्स डे पर विशेष भेंट 
    इस्लाम में हुक़ूक़ुल ऐबाद की फ़ज़ीलत व अहमियत
    इंसानी मुआशरे में सबसे ज़्यादा अहम रुक्न ख़ानदान है और ख़ानदान में सबसे ज़्यादा अहमियत वालदैन की है। वालदैन के बाद उनसे मुताल्लिक़ अइज़्जा वा अक़रबा के हुक़ूक़ का दर्जा आता है
    डाक्टर मोहम्मद उमर फ़ारूक़ क़ुरैशी
    1 जून, 2012
    (उर्दू से तर्जुमा- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)
    दुनिया के हर मज़हब व मिल्लत की तालीमात का ये मंशा रहा है कि इसके मानने वाले अमन व सलामती के साथ रहें ताकि इंसानी तरक़्क़ी के वसाइल को सही सिम्त में रख कर इंसानों की फ़लाहो बहबूद का काम यकसूई के साथ किया जाय। इस्लाम ने तमाम इंसानों के लिए ऐसे हुक़ूक़ का ताय्युन किया है जिनका अदा करना आसान है लेकिन उनकी अदायगी में ईसार व कुर्बानी ज़रूरी है।
    ये बात एक तरह का तर्बीयती निज़ाम है जिस पर अमल कर के एक इंसान ना सिर्फ ख़ुद ख़ुश रह सकता है बल्कि दूसरों के लिए भी बाइसे राहत बन सकता है। हुक़ूक़ की दो इक़्साम हैं । हुक़ूक़ुल्लाह और हुक़ूक़ुल ऐबाद। इस्लाम ने जिस क़दर ज़ोर हुक़ूक़ुल ऐबाद पर दिया है इससे ये अमर वाज़ेह हो जाता है कि इन हुक़ूक़ का कितना बुलंद मुक़ाम है और उनकी अदमे अदाइगी किस तरह अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की नाराज़गी का सबब बन सकती है।
    इस्लामी तालीमात की रू से बंदों के हुक़ूक़ की अदायगी इस्लामी नज़्मे इबादत का लाज़िमी जुज़ है और उन हुक़ूक़ से आराज़ व पहलू तही एक तरफ़ तो मुआशरे के बिगाड़ का सबब बन सकता है और दूसरी तरफ़ अल्लाह की नाराज़गी का सबब। लिहाज़ा बहैसियत मुसलमान हमें हुक़ूक़ुल ऐबाद की तरफ़ ज़्यादा तवज्जोह देनी चाहीए।
    इस्लाम एक ऐसा दीन है जो ख़ैरो बरकत और अमन व सलामती से इबारत है। इसमें अपने पराए, वाक़िफ़ नावाक़िफ़, बड़े छोटे, हाकिम मह्कूम, औरत मर्द, हर एक के हुक़ूक़ का ना सिर्फ ये कि एहतिमाम किया गया है बल्कि उनकी अदायगी को इबादत क़रार दिया गया है। इसलिए इस्लाम आलमे इंसानियत के लिए पाँच चीज़ों के तहफ़्फ़ुज़ औऱ निगेहदाश्त की ज़मानत फ़राहम करता है। हिफ़्ज़े नफ़स, हिफ़्ज़े माल, हिफ़्ज़े अर्ज़, हिफ़्ज़े दीन और हिफ़्ज़े नस् । उन पर ग़ौर करने से मालूम होगा कि इस्लाम इंसान की जान और उसके माल, उसकी इज़्ज़त, उसके दीन और उसकी नस्ल की हिफ़ाज़त का बहुत एहतेमाम करता है। लिहाज़ा हुक़ूक़ुल्लाह के बाद जब हम हुक़ूक़ुल ऐबाद की बात करते हैं तो इसमें एक इंसान पर दूसरे इंसान की इन पाँच चीज़ों की हिफ़ाज़त लाज़िम आती है।
    इंसानी मुआशरत में सबसे ज़्यादा अहम रुक्न ख़ानदान है और ख़ानदान में सबसे ज़्यादा अहमियत वालदैन की है। वालदैन के बाद उनसे मुताल्लिक़ अइज़्जा व अक़रबा के हुक़ूक़ का दर्जा आता है। इसके बाद जैसे जैसे इंसानी मुआशरे के ताल्लुक़ात वसीअ होते जाते हैं, वैसे वैसे इंसान आफ़ाक़ी हो जाता है और कायनात में मौजूद तमाम मख़लूक़ात से उसके ख़ुशगवार ताल्लुक़ात की इब्तेदा होती है। हर एक के लिए जो कम से कम हक़ है वो मीठा बोल है।
    तमाम तब्क़ात में से हर एक के हुक़ूक़ की तवील फ़ेहरिस्त तैय्यार हो सकती है लेकिन सबसे ज़्यादा जिस बात पर ज़ोर दिया गया है वो क़ौले करीम और क़ौले मारूफ़ है। अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने वाल्दैन के साथ हुस्ने सुलूक और एहसान के साथ जिस तफ़्सील का ज़िक्र किया है इसमें ज़बान को बुनियादी हैसियत हासिल है चुनांचे इरशाद फ़रमाया हैः इन दोनों (वालदैन) में से किसी को भी उफ़ तक ना कहो। बल्कि उनसे अच्छी बात कहो। इन आयात की तालीमात पर ग़ौर फ़रमाएं।
    पहले जिन दो बातों से मना किया गया है उनका ताल्लुक़ ज़बान ही से है। ज़बान से वाल्दैन को उफ़ तक ना कहो, उन्हें सख़्त अलफ़ाज़ में झिड़को भी नहीं। इसके बरख़िलाफ़ हुक्म ये हो रहा है कि इनके साथ नरमी से गुफ़्तुगु करो। गुफ़्तुगु करो। नरमी भी ऐसी जिससे रहमत व शफ़्क़त ,मोहब्बत व मौदत और रहमो करम टपकता हो। ये इसलिए कहा गया कि बूढ़े वाल्दैन को इस बुढ़ापे में सबसे ज़्यादा शीरीं कलामी की ज़रूरत है। जहां तक उनकी माद्दी ज़रूरियात का ताल्लुक़ है, वो अगर औलाद पूरा ना भी करे तो रब्बे कायनात उनकी रबूबियत उस वक़्त तक करता रहेगा जब तक उन्हें इस दुनिया में क़याम करना है।
    औलाद के करने का सबसे अहम काम ये है कि वो सब्र व तहम्मुल से काम ले, उन से तंग ना आए और उन के बुढ़ापे के अवारिज़ से परेशान ना हो जाए बल्कि उन से शीरीं कलामी के ज़रीए उनका दिल बहलाए, उनमें एतेमाद, उम्मीद जगाए और उनकी दिल बस्तगी का सामान करे। परवरदिगारे आलम ने अपने बंदों को ये उमूमी तालीम दी। इरशाद फ़रमायाः और लोगों के साथ भले तरीक़े से बात करो।
    रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इंसानी ज़िंदगी के किसी भी पहलू को ग़ैर अहम क़रार नहीं दिया। हज़रत अब्बू हुरैरा रज़िअल्लाहू अन्हू से मर्वी है कि एक सहाबी ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से दरयाफ़्त किया कि दुनिया में मुझ पर सबसे ज़्यादा हक़ किस का है यानी मेरे हुस्ने सुलूक का सबसे ज़्यादा मुस्तहिक़ कौन है तो आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया तुम्हारी माँ। सहाबी ने यही सवाल तीन मर्तबा दुहराया और तीनों मर्तबा आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने यही जवाब दिया कि तुम्हारे हुस्ने सुलूक की सबसे ज़्यादा मुस्तहिक़ तुम्हारी माँ है। चौथी मर्तबा आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि तुम्हारा बाप।
    एक और हदीस में आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि एक मुसलमान के दूसरे मुसलमान पर चंद हुक़ूक़ हैं। (1) जब मुसलमान भाई से मिले तो उसे सलाम करे (2) जब वो दावत दे तो उसे क़ुबूल करे (3) जब वो ख़ैर ख़्वाही चाहे तो उससे ख़ैर ख़्वाही की जाय (4) जब उसे छींक आए और वो अलहम्दोलिल्लाह कहे तो इसके जवाब में यरहमोकल्लाह कहे, और (5) जब वो इंतेक़ाल कर जाय तो इस के जनाज़े में शिरकत करे।
    हुस्ने खुल्क के बारे में आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का इरशादे गिरामी हैः सब से वज़नी चीज़ जो क़यामत के दिन मोमिन की मीज़ान में रखी जाएगी वो उसका हुस्ने एख़्लाक़ होगा। बेशक अल्लाह उस शख़्स को नापसंद फ़रमाता है जो ज़बान से बेहयाई की बात निकालता और बदज़बानी करता है। हज़रत अबदुल्लाह बिन मुबारक रज़ियल्लाहू अन्हू हुस्ने खुल्क की तशरीह यूं करते हैः और जब वो मिले तो हंसते हुए चेहरे से मिले और मोहताजों पर माल ख़र्च करे और किसी को तकलीफ़ ना दे।
    रहमतुललिल्आलमीन बंदों के बाहमी ताल्लुक़ात में बेहतरी और ख़ुशगवारी लाने के लिए अपने पैरोकारों को चंद ऐसी रुहानी बीमारियों से बचने की तलक़ीन फ़रमाते हैं जिनसे अगर एक इंसान बच जाय तो उसका वजूद बाइसे रहमत और उसकी हस्ती मूजिबे सुकून हो जाए। इरशाद नबवी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम है: अपने आप को बदगुमानी से बचाओ। दूसरों के बारे में मालूमात मत हासिल करते फ़िरो, एक दूसरे से बुग़्ज़ मत रखो और ना एक दूसरे की काट में लगे रहो।
    बंदों के हुक़ूक़ की अदायगी से इंसान की महरूमियाँ दूर हो जाती हैं और बाहमी मोहब्बत व यगांगत की फ़िज़ा पैदा हो जाती है। इस तरह बुग़् व अदावत का ख़ात्मा हो जाता है। ये बात ज़हन नशीन रहे कि हर आदमी सिर्फ अपने हुक़ूक़ की बात ना करे बल्कि फ़राइज़ को भी पहचाने। इस तरह हुक़ूक़ व फ़राइज़ के दरमियान एक मुनासिब तवाज़ुन बरक़रार रखे ताकि किसी का हक़ ग़सब ना हो और कोई फ़र्द महरूमियों का शिकार होकर इंतिहापसंदी की जानिब माएल ना हो।
    1 जून, 2012  बशुक्रियाः इन्क़िलाब,  नई दिल्ली
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    माँ की ममता

  • Friday, April 18, 2014
  • by
  • DR. ANWER JAMAL
  • ईरान में सात साल पहले एक लड़ाई में अब्‍दुल्‍ला का हत्यारा बलाल को सरेआम फांसी देने की तैयारी पूरी हो चुकी थी. इस दर्दनाक मंजर का गवाह बनने के लिए सैकड़ों का हुजूम जुट गया था. बलाल की आंखों पर पट्टी बांधी जा चुकी थी. गले में फांसी का फंदा भी लग चुका था.
    अब, अब्‍दुल्‍ला के परिवार वालों को दोषी के पैर के नीचे से कुर्सी हटाने का इंतजार था. तभी, अब्‍दुल्‍ला की मां बलाल के करीब गई और उसे एक थप्‍पड़ मारा. इसके साथ ही उन्‍होंने यह भी ऐलान कर दिया कि उन्‍होंने बलाल को माफ कर दिया है. इतना सुनते ही बलाल के घरवालों की आंखों में आंसू आ गए. बलाल और अब्‍दुल्‍ला की मां भी एक साथ फूट-फूटकर रोने लगीं.

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    सुब्हान-अल्लाह, ज़िन्दगी बनाए बेहतर

  • Wednesday, March 26, 2014
  • by
  • DR. ANWER JAMAL
  • आयुर्वेदिक और यूनानी प्रोडक्ट्स के होलसेलर सैयद सलीम अहमद साहब हमारे एक अच्छे दोस्त हैं। उनके इसरार पर उनके घर जाना हुआ तो उनके घर के चार बच्चों पर इज्तेमाई (सामूहिक) हाज़िरात की। कभी कभी हम हरेक पर अलग अलग हाज़िरात करने के बजाय कई पर एक साथ भी कर लेेते हैं।
    अगले दिन उनकी बेटी ने अपनी टीचर को बताया कि कैसे उसके साथ एक जिन्न (नज़र न आने वाला चेतन जीवधारी) लग गया था, जब वह उनके साथ मन्दिर के गेट तक गई थी!
    सलीम भाई की बेटी ने हमारी तारीफ़ में दो चार बातें मज़ीद ऐसी कह दीं कि उनकी टीचर ने फ़ोन करके हमसे मुलाक़ात का टाईम मांगा। बालीं-‘मैं किस वक्त और किसके साथ आऊँ?
    हमने कहा -‘आप अपनी सहूलत के वक्त अपनी मां या अपने दादा दादी वग़ैरह किसी के साथ आ सकती हैं।’
    उन्होंने कहा -’अपने दादा से तो मैं बोलती तक नहीं। मैं अपनी मम्मी के साथ आ जाऊँगी।’
    दादा से न बोलने की बात उनके जीवन में नकारात्मकता का पता दे रही थी। नकारात्मकता इंसान को कमज़ोर बनाती है और फिर वह कई तरह के हमलों का आसान शिकार बनकर रह जाता है।
    उससे अगले दिन 21 मार्च 2014 को वह अपनी मां और सलीम भाई की बेटी को साथ लेकर हमारे ग़रीबख़ाने पर तशरीफ़ ले आईं।
    ‘मेरा नाम भावना है।’-उन्होंने बनियों के एक गोत्र के साथ अपना पूरा नाम बताया।
    ‘जी, मुझे मालूम है।’-हमने जवाब दिया।
    भावना लगभग साढ़े पांच फ़ुट लम्बी बहुत साफ़ रंग की मालिका थीं। उन्होंने लेडीज़ स्टायल की पैन्ट शर्ट पहन रखी थी। उनके बाल भी स्टायल में कटे हुए थे जो उनके कंधों पर पड़े थे। उनकी मां का लिबास परम्परागत था लेकिन बाल उनके भी कटे हुए थे। सलीम भाई की बेटी दुपट्टे से सिर ढके बैठी थी।
    ‘आप बनिये के बजाय पंजाबी लगती हैैैं।’-हमने हंसते हुए भावना और उनकी मां से कहा।
    ‘हां, लोग हमें देखकर पंजाबी ही समझते हैं। हमने अपने बच्चों को ऐसे ही पाला है।’-भावना की मम्मी ने जवाब दिया।
    ‘क्या आप पंजाबियों के मुहल्ले में रहते हैं?’
    ‘नहीं, हम पंजाबियों के मुहल्ले में नहीं रहते।’
    हमने मक़सद की अहम बात करने से पहले उनसे हल्की फुल्की बात की ताकि वे रिलैक्स हो जाएं और हमें भी अपनी ही तरह का एक आम आदमी समझें। इससे आदमी अपनी बात खुलकर कह पाता है और किसी की समस्या को समझने के लिए उसके मन की अंदरूनी पर्तों की जानकारी बहुत ज़रूरी है।
    भावना अपनी समस्या का कारण जानने की जल्दी में थी। उसने पूछा-‘अंकल, यह बताईये कि कौन मेरे पीछे पड़ा है?’
    ‘मैं तो आपके पीछे बिल्कुल नहीं पड़ा हूं।’-मैं उसकी बात को हल्के से मज़ाक़ में बदल दिया। वे तीनों हंस पड़े।
    तब तक चाय नाश्ता भी आ गया। हम यही चाहते थे। भावना ने चाय के दौरान बातचीत में बताया कि उसके पापा की मौत हो चुकी है। वही अकेली घर चला रही है। उसके एक बहन है जिसकी शादी हो चुकी है और एक भाई है जो कि जॉब की तलाश कर रहा है। वह एक इंटरनेशनल इंग्लिश मीडियम स्कूल में टीचर हैं लेकिन उन्हें पढ़ाने के लिए उनका मनपसंद सब्जेक्ट नहीं दिया गया है। उनके पास पहले के मुक़ाबले ट्यूशन भी बहुत कम हो गए हैं। उम्र लगभग 27 साल हो चुकी थी लेकिन उनकी शादी भी नहीं हो पाई थी।
    ‘आखि़र मेरे सामने ये सारी परेशानियां क्यों आ रही हैं?’-हीरा, मूंगा और पन्ना की अंगूठियाँ पहनकर मेरे सामने बैठी भावना ने पूछा।
    ‘धन और ख़ुशियां लाने वाले सारे गैजेट्स तो आपने पहले ही पहन रखे हैं। फिर भी आपके जीवन में सफलता और ख़ुशियां नहीं हैं तो आप सोचिए कि ऐसा क्यों हो रहा है?’-हमने कहा।
    ‘भाई साहब! अब तो इसने कम पहन रखी हैं वर्ना तो यह दस की दस उंगलियों में अंगूठियां पहनती थी।’-भावना की मम्मी ने बताया।
    ‘अंकल! आप बताईये, क्या कारण है?’-भावना ने अपने दिमाग़ पर कोई ज़ोर डाले बिना ही फिर से सवाल कर दिया।
    ‘आपके अंदर नकारात्मकता है। आपके अंदर नाशुक्री है। जिस गॉड ने आपको पैदा किया और इतना अच्छा रंग और अच्छा क़द दिया। आपने कभी उसका शुक्र अदा नहीं किया।’-हमने उन्हें यह जानते हुए भी बताया कि वह मानेंगी नहीं। कोई भी आदमी यह नहीं मानना चाहता कि वह अपने क्रिएटर का नाशुक्रा है। हरेक आदमी ख़ुद को अच्छे गुणों से भरपूर मानता है। वह चाहता है कि उसकी नाकामियों और उसकी परेशानियों की ज़िम्मेदारी दूसरों पर डाल दी जाए कि उस आदमी ने साज़िश कर दी या उस आदमी ने जादू कर दिया। भावना भी कुछ ऐसा ही सुनना चाहती थीं। हमारी बात से उन्हें झटका लगा।
    ‘नहीं अंकल, मैं गॉड का तो बहुत शुक्र अदा करती हूं।’-भावना जी ने कहा।
    ‘अच्छा, अगर ऐसा है तो आप गॉड का नाम बताईये।’-हमने उनसे सवाल कर दिया। इस सवाल पर वह चकरा गईं।
    ‘गॉड का नाम तो पता नहीं है।’-उन्होंने शर्मिन्दगी के साथ क़ुबूल किया।
    ‘आपको अपने पैदा करने वाले गॉड का नाम तक मालूम नहीं है तो फिर आपने उसका शुक्र कैसे अदा कर दिया?’-हमने कहा। उन्हें चुप रह जाना पड़ा।
    ‘जिस मालिक ने आपको इतना ख़ूबसूरत जीवन दिया। आपने उसका शुक्र अदा नहीं किया लेकिन शिकवे पाल लिए। यह सोचने का ग़लत पैटर्न है। शिकवे-शिकायत का मतलब है कि आपकी सोच जीवन के अभाव पर कन्सन्ट्रेट है। यह सोच आपके जीवन में और ज़्यादा अभाव लेकर आती रहेगी। इसके बजाय आप यह देखें कि उस रब ने आपको कितना कुछ दिया है। इससे आपके अंदर शुक्र का जज़्बा पैदा होगा और इसके बाद आपके पास हर वह चीज़ बहुत कम कोशिश से आने लगेगी जिसकी तुम्हें ज़रूरत होगी।’-हमने उन्हें समझाया।
    ‘आपने तो इनसे कहा था कि कोई मेरे पीछे भी पड़ा है।’-भावना जी ने सलीम भाई की बेटी की तरफ़ इशारा करते हुए पूछा।
    ‘हां, यह सच है।’-हमने कहा।
    ‘मतलब...?’
    ‘मतलब यह कि आप पर कुछ ऐसा असर भी है जिसे पुराने लोग नज़र और जादू कहते हैं और आजकल के एजुकेटिड लोग जो इन नामों से चिढ़ते हैं वे इन्हें ‘सायकिक अटैक’ कहते हैं।’-हमने उन्हें खोलकर बताया।
    ‘इसके पीछे कौन है?’-हमने कहा कि यह सब हम नहीं बताएंगे बल्कि आप ख़ुद देख लेंगी, ...लेकिन इसके लिए हम आपको कोई तावीज़ वग़ैरह देने वाले नहीं हैं बल्कि आपको आपको अपने सोचने का पैटर्न बदलना पड़ेगा।’-हमने कहा।
    ‘अंकल! आप मुझे तावीज़ ज़रूर दीजिएगा।’-भावना जी ने कहा।
    ‘आप ज़िद करेंगी तो हम आपको तावीज़ दे देंगे लेकिन तब काम होने की कोई गारंटी नहीं है।’-हमने कहा।
    वह ख़ामोश रहीं। फिर बोलीं-‘अच्छा मुझे क्या करना होगा?’
    ‘आपको सबसे पहले अपने गॉड से, ईश्वर से, जिसने आपको पैदा किया है, उससे माफ़ी मांगनी होगी कि उसने आपको जीवन दिया और बड़े बड़े अहसान किये लेकिन आपने कभी उसका शुक्र अदा नहीं किया। रात को जब आप सोने के लिए बिस्तर पर लेटें, तब आप 2 मिनट तक उससे माफ़ी मांगे और फिर आप कुछ देर तक उस ईश्वर की पवित्रता का ध्यान करें और ‘सुब्हान-अल्लाह’ कहती रहें। आप ईश्वर को जिस गुण के साथ याद करेंगी, वह आपके जीवन में भी आ जाएगा। आपके जीवन में पवित्रता आएगी तो आपका मन हल्का हो जाएगा। जिसका असर आप अपने तन पर भी महसूस करेंगी और फिर आप उसका असर अपने जीवन में भी देखेंगी। आपका हरेक कष्ट आपसे ख़ुद ही रूख़सत हो जाएगा।
    क़ुरआन में हज़रत यूनुस अलैहिस्-सलाम के कष्ट दूर होने की वजह उनका तस्बीह (पवित्रता का बयान) करना बताया गया है। आपकी आंख रात में खुल जाए तो भी आप तस्बीह करें और सुबह को उठकर भी पहला काम यही करें और दिन में भी थोड़े थोड़े समय बाद ‘सुब्हान-अल्लाह’ कहती रहें। आप 40 दिन तक ऐसा करती रहें। इससे ईश्वर की पवित्रता का विश्वास आपके मन में गहराई तक बैठ जाएगा। तब आपके सोचने का पैटर्न बदल चुका होगा। आपकी सफलता की कुंजी आपके अंदर ही है। सबकुछ इनबिल्ट है। आपको अपनी चीज़ों से काम लेना सीखना होगा। इनमें सबसे बड़ी चीज़ आपकी सोच है। आपकी सोच आपके जीवन को प्रभावित करती है। आज आप जो कुछ हैं, वह आपकी पिछले दिनों की सोच और मेहनत का नतीजा है। अब आप जो सोचेंगी, उसका नतीजा आपको आने वाले दिनों में दिख जाएगा। पुरानी भावना की जगह एक नई भावना सामने आती चली जाएगी और आपको अहसास तक नहीं होगा।’
    ‘मेरे ऊपर अटैक के पीछे कौन हैं।’
    ‘क्या ज़रूरत है यह जानने की?’
    ‘अपने बचाव के लिए।’
    ‘ठीक है, आप ख़ुद ही देख लेंगी।’-हमने कहा। हमारे बच्चे वहां ज़रूरत की वजह से आ जा रहे थे। हमने अपने बड़े बेटे को पास बैठा लिया। व्यक्ति विचार है। विचार ज़िन्दा है तो व्यक्ति भी ज़िन्दा है। जो विचार अब हमें अपने उपयोग में ले रहा है, उसे हमारे बाद हमारे बेटे के दिल में होना है, इस तरह शरीर बदलेगा लेकिन मन की भावना नहीं। हमें अपने बच्चों को ज़िन्दगी और मौत की हक़ीक़त और इनसे काम लेने का तरीक़ा बहुत बारीकी से सिखाने की ज़रूरत है।
    ‘मेरी बहन के पति विदेश जाने की कोशिश कर रहे हैं। क्या वह जा पाएंगे?’-भावना ने पूछा।
    ‘ठीक है, यह हम देखकर बता देंगे, ज़रा चाय पी लें।’-हमने सिप लेते हुए कहा और फिर सोचा कि यह तो हमारे बेटे भी देख लेंगे। हमने चाय पीते हुए ही अपने बेटे से कहा कि ज़रा देखकर बताना। बेटे साहब मुराक़बा (ध्यान) के माहिर हैं। वह नमाज़ में सज्दे ज़रा लम्बे करते हैं। उन्होंने आंखें बन्द करके सवाल पर ध्यान किया और दो मिनट से भी कम वक्त में उन्होंने लैन्ड करता हुआ हवाई जहाज़ देखकर कहा कि हां, विदेश जाने के काम में कामयाबी पक्की है।
    ‘मेरे भाई की जॉब का क्या होगा?’
    ‘वह भी लग जाएगी। आपका हर काम बनता चला जाएगा। जो ईश्वर सारी गैलेक्सीज़ को संभाले हुए है, वही आपके सारे काम करता आया है और करता रहता है। आप उस पर भरोसा करें। ज़िन्दगी के तल्ख़ तजुर्बों को याद न करें। किसी ने आपको सताया हो तो भी यह राय न बनाएं कि यह दुनिया बड़ी ज़ालिम है और लोग बड़े ख़ुदग़र्ज़ हैं। ऐसे लोगों के लिए भी आप भलाई की दुआ करें और जो नेमतें आपके पास हैं, आप उनके बारे में सोचें, उनके बारे में उस मालिक का शुक्र अदा करें।
    आपको जुगाड़ का जीवन साथी नहीं बल्कि आपके मन का मीत, सोल-मेट मिलेगा। आपको जैसा जीवनसाथी चाहिए। उसके रूप-रंग, एजुकेशन, आमदनी और शहर के बारे में बिल्कुल साफ़ साफ़ सोचिए और फिर उसे एक काग़ज़ पर लिख लीजिए। उसके बाद आप उस रब से दुआ कीजिए। बिल्कुल वही जीवनसाथी आपको मिल जाएगा। वह विदेश में हुआ तो भी मालिक उसे आपके पास ले आएगा। वह बिना किसी दहेज के आपको अपनाएगा।
    जो लोग कन्फ़्यूज़ होते हैं और दहेज देने की तैयारी किए रखते हैं। उन्हें लालची लोग ही मिलते हैं और वे उनके साथ कैसा भी सुलूक करते रहते हैं। आपका शक, आपका डर और आपकी चिंताएं आपका भला नहीं करतीं बल्कि आपको बर्बाद करती रहती हैं।’
    विदा होने से पहले उन्होंने सलीम भाई की बेटी को कुछ नोट देकर हमसे जानना चाहा कि क्या हम कुछ रूपये लेना चाहेंगे?
    हमने कहा कि हम लेते नहीं हैं बल्कि देते हैं। बहरहाल वे तीनों रूख़सत हो गए और अगले ही दिन भावना ने फ़ोन करके बताया कि उनकी मम्मी ने हमारे बताए तरीक़े से ज़िक्र किया और फिर सो गईं तो उन्होंने सपने में एक बहुत ऊँचा पहाड़ देखा जो कि आकाश को छू रहा था।
    हमने कहा कि यह आपकी सफलता है, जो आपकी मम्मी ने देखी है।
    भावना ने बताया कि मैंने तीन लोगों को एक काला कपड़ा लेकर अपनी तरफ़ आते हुए देखा।
    हमने कहा कि ये आपके दुश्मन हैं।
    भावना ने कहा कि लेकिन ये लोग हैं कौन?
    हमने कहा कि आपको तरीक़ा बता दिया है। आप उसे करती रहें। हर चीज़ आप पर ख़ुद ही खुल जाएगी।
    भावना ने यह भी बताया कि अब वह बहुत हल्का महसूस कर रही है।
    यह उनका मन था। यह हमने उन्हें नहीं बताया।
    भावना ने बताया कि एक टीचर जो उनकी कम्पिटिटर है, उस पर आज डाँट भी पड़ी है। एक दिन में इतना सब, यह एक बड़ी कामयाबी थी।
    उसके एक दिन बाद भावना का फ़ोन फिर आया। उन्होंने बताया कि आज उन्हें सपने उनकी सबसे ख़ास सहेली नज़र आई जो उनके साथ ही टीचर है। उसने कहा कि तेरी दुश्मन कोई और नहीं बल्कि मैं हूँ।
    मुझे आज तक किसी ने कुछ नहीं कहा। सबके बारे में यही टीचर मुझे इन्फ़ॉर्म करती आयी हैं। क्या मैं इस सपने पर यक़ीन कर लूं?
    हमने कहा कि अभी आप सिर्फ़ एहतियात बरतें। हर चीज़ आप धीरे धीरे खुलती चली जाएगी।
    भावना ने बताया कि वह ख़ुद को अब और ज़्यादा हल्का महसूस कर रही हैं। उन्होंने अपनी मम्मी के बारे में भी पूछा कि वह श्रीकृष्ण जी का कीर्तन करती आई हैं। अब आपने प्रार्थना का यह तरीक़ा बता दिया है। उनके लिए बड़ी मुश्किल हो गई है। वह क्या करें?
    हमने कहा कि हम भी श्री कृष्ण जी को और श्री रामचन्द्र जी को मानते हैं। हम पक्के मनुवादी हैं।
    भावना को यक़ीन नहीं हुआ। उन्होंने ताज्जुब से पूछा कि क्या आप इन्हें मानते हैं?
    हमने कहा कि हां, ये हमारे पूर्वज थे। हम इनका आदर करते हैं। हम इन्हें महापुरूष मानते हैं लेकिन इन्हें ईश्वर नहीं मानते। महापुरूषों को महापुरूष मानना चाहिए और ईश्वर को ईश्वर। आप भी ऐसे ही मानिए। कीर्तन से प्रॉब्लम नहीं है लेकिन कीर्तन में कुछ ऐसी बातें कह दी जाती हैं जो न तो श्रीकृष्ण जी की शान के लायक़ हैं और न ही ईश्वर के। ऐसे कीर्तन से ज़रूर परहेज़ करना चाहिए और प्रार्थना एक ईश्वर के सिवा किसी और से हरगिज़ हरगिज़ नहीं करनी चाहिए। बहुतों से प्रार्थना करना एक ईश्वर की भक्ति और अनन्य निष्ठा के खि़लाफ़ है। एक ईश्वर से मांगने के बाद किसी और से मांगने की ज़रूरत ही शेष नहीं रह जाती। महापुरूष को ईश्वर और ईश्वर को महापुरूष समझ लेना अज्ञान है।
    भावना ने कहा कि हमारी मम्मी केवल कीर्तन करती हैं लेकिन श्री कृष्ण जी से प्रार्थना नहीं करतीं।
    इसका मतलब यह हुआ कि भावना को न कीर्तन के बारे में पता है और न उसमें कही जा रही बातों के बारे में। यह उनकी मम्मी के लिए केवल एक सामाजिक सांस्कृतिक परम्परा मात्र है। हर तरफ़ लोग बहुत कुछ कर रहे हैं लेकिन वे उनके मक़सद और सही तरीक़े को जाने बिना ही कर रहे हैं। जिसकी वजह से धार्मिक परम्पराओं का रूप विकृत हो जाता है। ऐसे लोगों की आज बहुत बड़ी तादाद है और आज यही लोग धार्मिक कहलाते हैं।
    अधिकतर लोगों को सही-ग़लत और ज़िन्दगी के मक़सद से सरोकार कम है। उन्हें अपनी समस्याओं का हल और फ़ायदा दरकार है।
    इस एंगल से भी धर्म और प्रार्थना फ़ायदेमन्द है। इससे हमें मन की शान्ति और एकाग्रता मिलती है। जीवन में शान्ति और एकाग्रता हो तो हम अपनी क़ाबिलियत का ज़्यादा अच्छा इस्तेमाल कर पाते हैं। यह एक जानी मानी हक़ीक़त है।
    आत्म-विकास के लिए शान्ति एक बुनियादी ज़रूरत है। यह सुब्हान-अल्लाह कहने और उसके भाव को मन में समा लेने से सहज ही मिल जाती है।
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    Special note: यह पब्लिश होने के बाद अभी अभी यानि 5:30 बजे शाम भावना जी ने फ़ोन करके बताया है कि उनके भाई की जॉब लग गयी है और उनके स्कूल में एक नया सेक्शन खुलने की शुरुआत हो गयी है जिसमें हो सकता है कि वही सब्जेक्ट पढ़ाया जाये जोकि वह पढ़ाना चाहती हैं.
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    मनुष्य की प्रजनन क्षमता बढ़ाने में रेड मीट मददगार garbhdharan

  • Wednesday, January 15, 2014
  • by
  • DR. ANWER JAMAL
  • लंदन। मांसाहार पसंद करने वालों के लिए यह एक अच्छी ख़बर हो सकती है। आहार विशेषज्ञों का कहना है कि रेड मीट में मिलने वाला पोषक तत्व प्रजनन क्षमता को बढ़ाता है। उनके मुताबिक़ संतान की चाह रखने वाले दंपतियों के स्वास्थ्य के लिए रेड मीट लाभदायक साबित हो सकता है।
    विशेषज्ञों का कहना है कि आहार में कुछ चीज़ों की कमी से गर्भधारण करने में समस्या आ सकती है। विटामिन बी 6 ऐसी ही एक चीज़ है। इस विटामिन को प्रजनन और गर्भधारण की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है और रेड मीट में यह पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। इस आधार पर वैज्ञानिकों का मानना है कि रेड मीट का सेवन परिवार बढ़ाने के लिए अहम साबित हो सकता है।
    रेड मीट मांस का वह प्रकार है जो कच्चे में लाल रंग का दिखाई पड़ता है और पकने पर सफ़ेद नहीं रह जाता। वयस्क स्तनपायियों के मांस को रेड मीट की श्रेणी में रखा जाता है। आहार विशेषज्ञ कैरी रक्सटन ने कहा कि उम्रदराज़ महिलाएं प्रजनन क्षमता को रेड मीट से जोड़कर बताती रही हैं।
    दैनिक हिन्दुस्तान दिनांक 13 जनवरी 2014 अंतिम पृष्ठ

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    माँ को घर से हटाने का अंजाम औलाद की तबाही

  • Wednesday, November 27, 2013
  • by
  • DR. ANWER JAMAL
  • मिसालः‘आरूषि-हेमराज मर्डर केस’
    आज दिनांक 26 नवंबर 2013 को विशेष सीबीाआई कोर्ट ने ‘आरूषि-हेमराज मर्डर केस’ में आरूषि के मां-बाप को ही उम्रक़ैद की सज़ा सुना दी है। फ़जऱ्ी एफ़आईआर दर्ज कराने के लिए डा. राजेश तलवार को एक साल की सज़ा और भुगतनी होगी। उन पर 17 हज़ार रूपये का और उनकी पत्नी डा. नुपुर तलवार पर 15 हज़ार रूपये का जुर्माना भी लगाया गया है। दोनों को ग़ाजि़याबाद की डासना जेल भेज दिया गया है। डा. नुपुर तलवार इससे पहले सन 2012 में जब इसी डासना जेल में बन्द थीं तो उन्होंने जेल प्रशासन से ‘द स्टोरी आॅफ़ एन अनफ़ार्चुनेट मदर’ शीर्षक से एक नाॅवेल लिखने की इजाज़त मांगी थी, जो उन्हें मिल गई थी। शायद अब वह इस नाॅवेल पर फिर से काम शुरू कर दें। जेल में दाखि़ले के वक्त उनके साथ 3 अंग्रेज़ी नाॅवेल देखे गए हैं। 
    आरूषि का बाप राकेश तलवार और मां नुपुर तलवार, दोनों ही पेशे से डाॅक्टर हैं। दोनों ने आरूषि और हेमराज के गले को सर्जिकल ब्लेड से काटा और आरूषि के गुप्तांग की सफ़ाई की। क्या डा. राजेश तलवार ने कभी सोचा था कि उन्हें अपनी मेडिकल की पढ़ाई का इस्तेमाल अपनी बेटी का गला काटने में करना पड़ेगा?
    डा. नुपुर तलवार ने भी कभी नहीं सोचा होगा कि उसकी जि़न्दगी में कोई ऐसी मनहूस घड़ी आएगी जबकि उसकी पेशेवर सलाहियत उसी की बेटी का गुप्तांग धोने के काम आएगी। दोनों डाक्टर पति पत्नी अपनी बेटी आरूषि से बहुत प्यार करते थे। सीबीआई का भी कहना है कि उन्होंने आरूषि की हत्या इरादतन नहीं की।
    डा. राकेश तलवार ने 15 व 16 मई 2008 की दरम्यानी रात को अपने नेपाली नौकर हेमराज को आरूषि के कमरे में ऐसी हालत में देख लिया। जिसे देखकर वह अपना आपा खो बैठे और उस पर एक गोल्फ़ स्टिक से हमला कर दिया। ऐश का सामान तैश में इस्तेमाल किया तो नतीजा यह हुआ कि पहला वार हेमराज के सिर पर लगा लेकिन दूसरा वार उनके हाथ से आरूषि के माथे पर जा लगा और वह मर गई। उसकी मौत को छिपाने के लिए डा. राजेश ने बेटी का गला एक सर्जिकल ब्लेड से काट दिया। गला कटने पर उसकी धमनी से तेज़ी के साथ ख़ून नहीं निकला। यह पोस्टमार्टम की रिपोर्ट से साबित है। 
    हेमराज जि़न्दा रहता तो वह पुलिस को बता सकता था कि आरूषि को उसके बाप ने ही मारा है। सज़ा से बचने के लिए डा. राजेश को हेमराज को भी मारना पड़ा। उसका गला भी उसी सर्जिकल ब्लेड से काट दिया गया। दोनों ने उसकी लाश को छत पर डाल दिया और दरवाज़े पर ताला लगा दिया। दिन निकला तो डा. राजेश तलवार ने अपने नौकर हेमराज को आरूषि के क़त्ल में नामज़द करते हुए पुलिस में रिपोर्ट लिखवा दी। पुलिस ने सीढि़यों पर ख़ून के निशान देखकर उनसे दरवाज़े की चाभी मांगी तो उन्होंने इनकार कर दिया। पुलिस को ताला तोड़ना पड़ा और तब नौकर की लाश उनकी छत पर ही मिल गई। डा. राजेश तलवार ने अपने नौकर की लाश को पहचानने से ही इन्कार कर दिया।
    आरूषि का पोस्टमार्टम करने वाले डा. दोहरे पर राकेश तलवार ने भी दबाव डाला कि वह अपनी रिपोर्ट में यौन संबंध की तस्दीक़ न करे। उसके गुप्तांग को पानी से धोने की बात भी सामने आई है। यह काम डा. नुपुर तलवार ने किया था। डा. नुपुर एक अच्छी मां भले ही न बन पाईं लेकिन वह एक अच्छी पत्नी ज़रूर साबित हुईं। वह हर क़दम पर अपने पति का साथ देती रहीं। अगर वह थोड़ा सा सजग रहतीं तो वह एक अच्छी मां भी साबित सकती थीं।
    देखने में यह घटना महज़ एक मनहूस हादसा लगती है लेकिन कोई भी हादसा बे-सबब नहीं होता। हक़ीक़त यह है कि इस घटना के असबाब (कारण) मां-बाप ने ख़ुद ही जमा किए हैं। ये असबाब  करोड़ों परिवारों में मौजूद हैं। उन परिवारों में भी ऐसी दुर्घटना संभव है।
    क्या हैं वे असबाब ?, वक्त का तक़ाज़ा है कि इस पर ग़ौरो-फि़क्र किया जाए।
    सबसे पहला और सबसे अहम सबब है, माॅडर्न सोसायटी में मां के रोल को बदल देना। मां को घर से हटाने का मतलब है बच्चों को बर्बाद कर देना।
    मां-बाप औलाद को मिलकर पालते हैं। बाप कमाता है और मां पकाकर खिलाती है। आज भी ज़्यादातर हिन्तुस्तानी घरों में यही होता है। पहले ज़रूरत और मजबूरी में ही औरत घर से बाहर कमाने के लिए निकलती थी। अगर पहले बाप के काम को काम माना जाता था तो मां का काम, काम से ज़्यादा क़ुरबानी माना जाता था।
    माॅडर्न लाइफ़ स्टाइल ने उन औरतों को वर्किंग-वूमेन माना है जो सीधे तौर पर रूपया कमाने का कोई काम कर रही हैं। घर पर बच्चों की देखभाल का बहुत बड़ा काम अंजाम देने वाली औरत को हाउस-वाइफ़ यानि घरेलू औरत कह दिया जाता है। मानो वह कोई काम ही न करती हो या उसके काम की कोई ख़ास अहमियत ही न हो। इस तरह बेशक पैसा तो डबल आ जाता है लेकिन बच्चा अधूरा रह जाता है। वह मां के प्यार, उसकी निगरानी और उसकी तरबियत (अच्छे अख़लाक़ और संस्कार) से महरूम ही रह जाता है। 
    मां बाप इस कमी की भरपाई के लिए घर में नौकर रख लेते हैं लेकिन कोई नौकर मां का बदल नहीं हो सकता। बच्चा अपना अकेलापन टी. वी. और इन्टरनेट के सहारे दूर करना चाहता है तो पोर्न फि़ल्में उसके मन में बेहयाई और जरायम के बीज बो देती हैं। नई उम्र के बच्चे जो देखते हैं, उसे आज़माने की कोशिश करते हैं। इस तरह मां की ग़ैर-मौजूदगी बच्चों से उनका बचपन छीन रही है।
    दूसरा सबब पैसे की हवस है। असल में इसी हवस की ख़ातिर मां के रोल को बदला गया है। जि़न्दगी की ज़रूरतें पूरी होने के बाद भी लोग अपनी दौलत के ढेर को ज़्यादा से ज़्यादा बड़ा कर लेना चाहते हैं। 
    तीसरा सबब जहालत है। जिसे हिन्दी में अज्ञान कहा जाता है। अज्ञान गहरा अर्थ रखता है। शिक्षित लोग भी अज्ञानी हो सकते हैं। आरूषि के मां-बाप डाक्टर होने के बावुजूद भी जाहिल अर्थात अज्ञानी ही रह गए।
    अकेली कमसिन लड़की के पास एक पुख्ता जवान आदमी को छोड़ने के लिए न तो धर्म कहता है और न ही मनोविज्ञान। उन्होंने न धर्म की मानी और न ही साइंस की। इसी का नाम जहालत है। शराब पीना जहालत है। पुलिस ने डा. राकेश तलवार की डायनिंग टेबल से शराब की बोतल भी बरामद की है। आरूषि के मर्डर के बाद शराब भी पी गई थी। हेमराज भी शराबी रहा हो तो कोई ताज्जुब नहीं। बाप घर में बैठकर शराब पिए और बच्चों से चरित्रवान बनने की उम्मीद करे। इसे भी जहालत में गिना जाएगा। मां-बाप सिर्फ़ रूपया कमाने की मशीन ही नहीं होते बल्कि वे अपने अमल से अपने बच्चों के सामने एक आदर्श भी पेश करते हैं। 
    एजुकेशन का मक़सद अगर रूपया और रूतबा कमाना है तो डा. राकेश तलवार और नुपुर तलवार ने यह पा लिया है लेकिन आज उनके पास उनकी बेटी आरूषि नहीं है और वे ख़ुद जेल में हैं तो ये दोनों चीज़ें उनके लिए बेकार हैं।
    फिर एजुकेशन का मक़सद क्या है?
    एजुकेशन का मक़सद न जानना चैथा सबब है। लोग एजुकेटिड हैं लेकिन वे एजुकेशन का मक़सद नहीं जानते। यही वजह है कि एजुकेशन के साथ साथ क्राइम का ग्राफ़ भी बढ़ रहा है और बड़े क्राइम पढ़े लिखे लोग ही कर रहे हैं।
    पांचवा सबब है जि़न्दगी के मक़सद को न जानना। यह पांचवा सबब दरअसल बुनियादी सबब है। जि़न्दगी को आप किस नज़र से देखते हैं, यह बात आपके जीने के तरीक़े को ही बदल देती है। जो लोग जीने का मक़सद और जीने का सही तरीक़ा जानते हैं। वे अपने घर में जवान अजनबी आदमी तो क्या कुत्ता तक घुसने नहीं देते।
    लोग जी रहे हैं लेकिन वे नहीं जानते कि जि़न्दगी का मक़सद क्या है?
    माॅडर्न सोसायटी ने अपनी जहालत की वजह से मां के रोल के साथ जो छेड़छाड़ की है, उसी का एक भयानक नतीजा है ‘आरूषि-हेमराज मर्डर केस’। इस हादसे के आईने में हम सब अपना जायज़ा ले सकते हैं कि हमारे घर में तो इन असबाब में से कोई मौजूद नहीं है?
    बच्चों को पालना है तो अच्छा मां-बाप बनना सीखना होगा। जि़म्मेदार मां-बाप बनने की बातें स्कूल-काॅलेज के सिलेबस में रखी ही नहीं हैं। इसके लिए अपने अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे मां-बाप से ही तालीम लेनी होगी या फिर देखिए उन मां-बापों को, जिन्होंने अपने बच्चों को बिना किसी स्कूल-काॅलेज के ही इतना अच्छा बना दिया कि आज तक दुनिया उनके नक्शे-क़दम पर चलकर कामयाबी हासिल कर रही है। मां-बाप पर कल भी लाजि़म था और उन पर आज भी लाजि़म है कि वे पहले ख़ुद सही और ग़लत की तमीज़ सीखें और फिर अपने बच्चों को सिखाएं।
    इसी के साथ ख़ुदग़जऱ्ी से भी निकलना होगा। सिर्फ़ अपने भले के बजाय दूसरों की भलाई के बारे में भी सोचना होगा। सबको सही-ग़लत की तमीज़ देनी होगी। कोई जवान आदमी पैसे और रोज़गार की कमी की वजह से अविवाहित न रहे और न ही किसी विवाहित मर्द को पैसे की ख़ातिर अपने बीवी-बच्चों से दूर जाने के लिए मजबूर होना पड़े। इसकी व्यवस्था करनी होगी। अगर कमज़ोर वर्ग की बुनियादी ज़रूरतें पूरी न हुई तो आप पर किसी भी तरफ़ से मुसीबत का हमला हो सकता है। 
    हमारी सुरक्षा हमारे विचार पर निर्भर है। हमारी ख़ुशियां हमारे नज़रिए की देन हैं।

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    छात्रा से किया 75 बार balatkar

  • Tuesday, October 22, 2013
  • by
  • DR. ANWER JAMAL
  • आम तौर पर आप जब भी किसी से समाज में गिरते मूल्यों को ऊपर उठाने के बारे विचार विमर्श करेंगे तो यह सुनने को मिलता है कि शिक्षा इन सब समस्याओं का हल है. ...लेकिन क्या सचमुच शिक्षा समाज से बुराईयों को हटा रही है ? ताज़ा खबर यह है कि एक अध्यापक ने चौथी क्लास की अपनी शिष्या से बलात्कार करना शुरू किया तो 75 बार कर डाला। इसलिए सब अपने बच्चे बच्चियों की हिफाज़त के लिये उनके टीचरों पर सतर्क दृष्टि ज़रूर रखे. पूरी ख़बर पढने के लिए अखबार की कटिंग देख लें. एक बार फिर सोचिये कि कौन सी चीज़ हमसे छूट रही है ? 


    ऐसे बहुत से केस हैं बल्कि ज़ुल्म के शिकार तमाम केस इस बात के गवाह हैं कि उन्हें बरसों भटकने के बाद भी दुनिया में न्याय नहीं मिल पाया. इसीलिये वैदिक धर्म और इसलाम में ही नहीं बल्कि अन्य धर्मों में भी मरने के बाद पीड़ितों को न्याय मिलने और पापियों को नर्क की आग में जलाये जाने का बयान मिलता है. नास्तिकों ने इस बात को मानने से ही इंकार कर दिया है. जीवन और मौत के बारे में सही जानकारी की कमी भी जरायम बहने का एक सबब है. हमें अपने बच्चों को बुरे लोगों की शिनाख्त कराने के साथ यह भी बताना चाहिये कि हमें किसने पैदा किया है और क्या करने के लिये पैदा किया है और
    नास्तिक बताते हैं कि दुनिया में तो किसी के साथ न्याय होता नहीं है. जिसका ज़ोर चलता है लोगों से अपने काम करवाता है, उनका शोषण करता है. मरने के बाद शोषण करने वाले और ज़ुल्म का शिकार होने वाले दोनों मरकर मिट्टी में मिल जाते हैं.
    सवाल यह है कि जब वे समाज में ऐसी बातें फैलाते हैं तो ताक़तवर लोग ज़ुल्म करने क्यों डरेंगे ?
    हम जानते ही हैं कि एक ही अधिकारी अमीर और गरीब के साथ क्या बर्ताव करते हैं ?
    नास्तिकता किसी समस्या का हल नहीं है बल्कि यह समस्याओं को बढ़ा रही है.
    नास्तिकों में वे लोग भी शामिल समझे जाने चाहियें जो धर्म का नाम लेते हैं लेकिन धर्म की बात नहीं मानते.
    Source: http://pyarimaan.blogspot.in/2013/10/75-balatkar.html
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    बेटी को इज़्ज़त दो, इज़्ज़त की ज़िन्दगी जीने के लिए

  • Monday, September 23, 2013
  • by
  • HAKEEM YUNUS KHAN

  • इस्लाम में औरत का मुकाम: एक झलक

    इस्लाम को लेकर यह गलतफहमी है और फैलाई जाती है कि इस्लाम में औरतको कमतर समझा जाता है। सच्चाई इसके उलट है। हम इस्लाम का अध्ययनकरें तो पता चलता है कि इस्लाम ने महिला को चौदह सौ  साल पहले वहमुकाम दिया है जो आज के कानून दां भी उसे नहीं दे पाए।
    इस्लाम में औरत के मुकाम की एक झलक देखिए।
    जीने का अधिकार शायद आपको हैरत हो कि इस्लाम ने साढ़े चौदह सौ सालपहले स्त्री को दुनिया में आने के साथ ही अधिकारों की शुरुआत कर दी और उसेजीने का अधिकार दिया। यकीन ना हो तो देखिए कुरआन की यह आयत-
    और जब जिन्दा गाड़ी गई लड़की से पूछा जाएगाबता तू किस अपराध केकारण मार दी गई?"(कुरआन81:8-9) )
    यही नहीं कुरआन ने उन माता-पिता को भी डांटा जो बेटी के पैदा होने परअप्रसन्नता व्यक्त करते हैं- 
    'और जब इनमें से किसी को बेटी की पैदाइश का समाचार सुनाया जाता है तो उसका चेहरा स्याह पड़ जाता है और वह दु:खी हो उठता है। इस 'बुरी'खबर के कारण वह लोगों से अपना मुँह छिपाता फिरता है। (सोचता हैवह इसे अपमान सहने के लिए जिन्दा रखे या फिर जीवित दफ्न कर देकैसेबुरे फैसले हैं जो ये लोग करते हैं।' (कुरआन16:58-59))
    बेटी
    इस्लाम के पैगम्बर मुहम्मद सल्लने फरमाया-बेटी होने पर जो कोई उसे जिंदा नहीं गाड़ेगा (यानी जीने का अधिकार देगा)उसे अपमानित नहीं करेगाऔर अपने बेटे को बेटी पर तरजीह नहीं देगा तो अल्लाह ऐसे शख्स को जन्नत में जगह देगा।इब्ने हंबल) अन्तिम ईशदूत हजऱत मुहम्मद सल्लनेकहा-'जो कोई दो बेटियों को प्रेम और न्याय के साथ पालेयहां तक कि वे बालिग हो जाएं तो वह व्यक्ति मेरे साथ स्वर्ग में इस प्रकार रहेगा (आप नेअपनी दो अंगुलियों को मिलाकर बताया)
    मुहम्मद सल्लने फरमाया-जिसके तीन बेटियां या तीन बहनें हों या दो बेटियां या दो बहनें हों और वह उनकी अच्छी परवरिश और देखभाल करे औरउनके मामले में अल्लाह से डरे तो उस शख्स के लिए जन्नत है। (तिरमिजी)
    पत्नी
    वर चुनने का अधिकार : इस्लाम ने स्त्री को यह अधिकार दिया है कि वह किसी के विवाह प्रस्ताव को स्वेच्छा से स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है।इस्लामी कानून के अनुसार किसी स्त्री का विवाह उसकी स्वीकृति के बिना या उसकी मर्जी के विरुद्ध नहीं किया जा सकता।
    बीवी के रूप में भी इस्लाम औरत को इज्जत और अच्छा ओहदा देता है। कोई पुरुष कितना अच्छा हैइसका मापदण्ड इस्लाम ने उसकी पत्नी को बनादिया है। इस्लाम कहता है अच्छा पुरुष वही है जो  अपनी पत्नी के लिए अच्छा है। यानी इंसान के अच्छे होने का मापदण्ड उसकी हमसफर है। 
    पैगम्बर मुहम्मद सल्लने फरमाया-
    तुम में से सर्वश्रेष्ठ इंसान वह है जो अपनी बीवी के  लिए सबसे अच्छा है। (तिरमिजीअहमद)
    शायद आपको ताज्जुब हो लेकिन सच्चाई है कि इस्लाम अपने बीवी बच्चों पर खर्च करने को भी पुण्य का काम मानता है।
    पैगम्बर मुहम्मद सल्लने फरमाया-
    तुम अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए जो भी खर्च करोगे उस पर तुम्हें सवाब (पुण्यमिलेगायहां तक कि उस पर भी जो तुम अपनी बीवी कोखिलाते पिलाते हो। (बुखारी,मुस्लिम)
    पैगम्बर मुहम्मद सल्लने कहा-आदमी अगर अपनी बीवी को कुएं से पानी पिला देता हैतो उसे उस पर बदला और सवाब (पुण्यदिया जाता है।(अहमद)
    मुहम्मद सल्लने फरमाया-महिलाओं के साथ भलाई करने की मेरी वसीयत का ध्यान रखो। (बुखारीमुस्लिम)
    माँ
    क़ुरआन में अल्लाह ने माता-पिता के साथ बेहतर व्यवहार करने का आदेश दिया है,
    'तुम्हारे स्वामी ने तुम्हें आदेश दिया है कि उसके सिवा किसी की पूजा  करो और अपने माता-पिता के साथ बेहतरीन व्यवहार करो। यदि उनमें से कोईएक या दोनों बुढ़ापे की उम्र में तुम्हारे पास रहें तो उनसे 'उफ् तक  कहो बल्कि उनसे करूणा के शब्द कहो। उनसे दया के साथ पेश आओ और कहो
    ' हमारे पालनहारउन पर दया करजैसे उन्होंने दया के साथ बचपन में मेरी परवरिश की थी।(क़ुरआन17:23-24))
    इस्लाम ने मां का स्थान पिता से भी ऊँचा करार दिया। ईशदूत हजरत मुहम्मद(सल्ल) ने कहा-'यदि तुम्हारे माता और पिता तुम्हें एक साथ पुकारें तोपहले मां की पुकार का जवाब दो।
    एक बार एक व्यक्ति ने हजरत मुहम्मद (सल्ल.) से पूछा'हे ईशदूतमुझ पर सबसे ज्यादा अधिकार किस का है?'
    उन्होंने जवाब दिया 'तुम्हारी माँ का', 
    'फिर किस का?' उत्तर मिला 'तुम्हारी माँ का',
    'फिर किस का?' फिर उत्तर मिला 'तुम्हारी माँ का
    तब उस व्यक्ति ने चौथी बार फिर पूछा 'फिर किस का?' 
    उत्तर मिला 'तुम्हारे पिता का।'
    संपत्ति में अधिकार-औरत को बेटी के रूप में पिता की जायदाद और बीवी के रूप में पति की जायदाद का हिस्सेदार बनाया गया। यानी उसे साढ़े चौदहसौ साल पहले ही संपत्ति में अधिकार दे दिया गया।
    http://www.erfan.ir/article/article.php?id=58888
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