तमाम प्रयासों के बावजूद भारत में जच्चा-बच्चा की मृत्यु दर में खास सुधार नहीं आ पा रहा है। इस दिशा में वाकई बहुत काम किए जाने की जरूरत है। कानपुर के आसपास की बस्तियों में श्रमिक भारती नाम की एक संस्था इस मामले में बहुत अच्छा काम कर रही है। संजीवनी नाम की इस परियोजना में इस बात पर जोर दिया गया कि गर्भवती महिलाओं के इलाज में गांव के ही संसाधनों का अधिक से अधिक इस्तेमाल हो। अस्पताल ले जाने के लिए यातायात से लेकर धन की व्यवस्था तक। गांव में जिन व्यक्तियों के पास वाहन उपलब्ध था, उन्हें विशेष तौर पर मातृत्व सुरक्षा अभियान से जोड़ा गया। उन्हें बताया गया कि मातृ रक्षा जनहित का सबसे बड़ा कार्य है। गांव में चंदा एकत्र कर एक कोष बनाया गया, जिससे जरूरतमंद जच्चा के इलाज की व्यवस्था की गई। गांवों में ‘संजीवनी सहेलियों’ का चयन किया गया, जिन्हें मातृत्व सुरक्षा की ट्रेनिंग दी गई। गर्भवती महिलाओं वाले परिवारों में संजीवनी सहेलियों ने ज्यादा बातचीत की। निर्धन परिवारों को बताया गया कि किन सस्ते पर पौष्टिक खाद्यान्नों से महिलाओं की जरूरतें पूरी हो सकती हैं, जो गांव में आसानी से उपलब्ध हों। गांव में उपलब...
बस एक माँ है जो मुझ से कभी ख़फ़ा नहीं होती