बेसन की सोंधी रोटी बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ याद आती है चौका बासन चिमटा फुँकनी जैसी माँ बान की खूर्रीं खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे आधी सोई आधी जागी थकी दुपहरी जैसी माँ चिड़ियों की चहकार में गूँजे राधा-मोहन अली-अली मुर्गे की आवाज़ से खुलती घर की कुंडी जैसी माँ बीवी बेटी बहन पड़ोसन थोड़ी थोड़ी सी सब में दिनभर एक रस्सी के ऊपर चलती नटनी जैसी माँ बाँट के अपना चेहरा माथा आँखें जाने कहाँ गईं फटे पुराने इक अलबम में चंचल लड़की जैसी माँ - निदा फ़ाज़ली [विवेक जी ने अपने ब्लॉग पर यह पोस्ट प्रस्तुत की है .उनके ब्लॉग का url -'' http://vivj2000.blogspot.कॉम '' है .] शिखा कौशिक
बस एक माँ है जो मुझ से कभी ख़फ़ा नहीं होती