खुदा का नूर ''माँ''

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  • Saturday, February 26, 2011
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  • shikha kaushik
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  • बड़े तूफ़ान में फंसकर भी मैं बच जाती हूँ ;
    दुआएं माँ की मेरे साथ साथ चलती हैं .
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    तमाम जिन्दगी उसकी ही तो अमानत है  ;
    सुबह होती है उसके साथ ;शाम ढलती है .
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    खुदा का नूर है वो रौशनी है आँखों की ;
    शमां बनकर वो दिल के दिए में जलती है 
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    नहीं वजूद किसी का कभी उससे अलग ;
    उसकी ही कोख में ये कायनात पलती है .
    ***********************************
    उसके साये में गम के ओले नहीं आ सकते ;
    दूर उससे हो तो ये बात बहुत खलती है .
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    मेरे लबो पे सदा माँ ही माँ  रहता है ;
    इसी के  डर से  बला अपने आप टलती है .
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      http://shikhakaushik666.blogspot.com/

    5 comments:

    शालिनी कौशिक said...

    maa ki mahima aapne apne shabdon me bahut khoobsoorti se vyakt ki hai.

    DR. ANWER JAMAL said...

    दिल है , ख़ुशबू है रौशनी है माँ
    अपने बच्चों की ज़िंदगी है माँ

    रश्मि प्रभा... said...

    नहीं वजूद किसी का कभी उससे अलग ;
    उसकी ही कोख में ये कायनात पलती है .
    sach hai...

    सदा said...

    वाह ...बहुत ही सुन्‍दर भावमय करते शब्‍द ।

    वन्दना said...

    वाह …………बेहद भावप्रवण रचना।

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