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माँ

रात की अलस उनींदी आँखों में एक स्वप्न सा चुभ गया है , कहीं कोई बेहद नर्म बेहद नाज़ुक ख़याल चीख कर रोया होगा । सुबह के निष्कलुष ज्योतिर्मय आलोक में अचानक कालिमा घिर आयी है , कहीं कोई चहचहाता कुलाँचे भरता मन सहम कर अवसाद के अँधेरे में घिर गया होगा । दिन के प्रखर प्रकाश को परास्त कर मटियाली धूसर आँधी घिर आई है , कहीं किसी उत्साह से छलछलाते हृदय पर कुण्ठा और हताशा का क़हर बरपा होगा । शिथिल शाम की अवश छलकती आँखों में आँसू का सैलाब उमड़ता जाता है , कहीं किसी बेहाल भटकते बालक को माँ के आँचल की छाँव अवश्य मिली होगी । साधना वैद