‘‘दुनिया से मिली न वफाएं तो क्या गम था, हसरतें रही अधूरी तो क्या गम था, रूसवाईयां तो तब हुई जब अपनों ने ही ठुकरा दिया, वरना कभी हम भी खुशनसीब थे, हमें भी क्या गम था।’’ आंखों में आंसू, चेहरे में बेबसी लिये कुछ यूं ही अपने दिल का दर्द बयां कर रहे हैं आज के बुजुर्ग। जिन्हें वक्त की मार ने तो कम बल्कि अपनों के तिरस्कार ने ज़्यादा रूलाया है। ये बूढ़े मां-बाप जिन्होंने कभी अपने बच्चों में बुढ़ापे की लाठी तलाशी थी, आज इन्हीं बच्चों ने उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने के लिए बेसहारा छोड़ दिया है। वैसे कहते है माता-पिता का दर्जा भगवान से भी बढ़कर होता हैं। शायद तभी किसी ने कहा भी है,‘‘धरती पर रहने वाले भगवान यानि माता-पिता को खुश कर लिया तो स्वर्ग में बैठे भगवान अपने आप ही खुश हो जायेंगे।’’ जब माता-पिता ईश्वर से भी बढ़कर है फिर क्यों हमें ऐसे असहाय बुजुर्ग देखने को मिलते हैं जिन्हें उनके बच्चों ने ही धुतकार दिया? क्या इन बच्चों को याद नहीं जब वो छोटे थे तो किसने उन्हें उंगली पकड़कर चलना सिखाया था? और किसने उनके मुंह में निवाला डाला था? हां ये वहीं मां-बाप है जिन्होंने तुम्हारी खुशियों के लिए अपने गम ...
बस एक माँ है जो मुझ से कभी ख़फ़ा नहीं होती