मैं चुराकर लाई हुं तेरी वो तस्वीर जो हमारे साथ तूने खींचवाई थी मेरे परदेस जाने पर। में चुराकर लाई हुं तेरे हाथों के वो रुमाल जिससे तूं अपना चहेरा पोंछा करती थी। मैं चुराकर लाई हुं वो तेरे कपडे जो तुं पहना करती थी। मैं चुराकर लाई हुं पानी का वो प्याला, जो तु हम सब से अलग छूपाए रख़ती थी। मैं चुराकर लाई हुं वो बिस्तर, जिस पर तूं सोया करती थी। मैं चुराकर लाई हुं कुछ रुपये जिस पर तेरे पान ख़ाई उँगलीयों के नशाँ हैं। मैं चुराकर लाई हुं तेरे सुफ़ेद बाल, जिससे मैं तेरी चोटी बनाया करती थी। जी चाहता है उन सब चीज़ों को चुरा लाउं जिस जिस को तेरी उँगलीयों ने छुआ है। हर दिवार, तेरे बोये हुए पौधे , तेरी तसबीह , तेरे सज़द े , तेरे ख़्वाब , तेरी दवाई , तेरी रज़ाई। यहां तक की तेरी कलाई से उतारी गई वो , सुहागन चुडीयाँ, चुरा लाई हुं “माँ”। घर आकर आईने के सामने अपने को तेरे कपडों में देख़ा तो , मानों आईने के उस पार से तूं बोली , “ बेटी कितनी यादोँ को समेटती...
Comments
माँ लहरों के विपरीत
संभावनाओं के द्वार खोलती है
बिलकुल सही बात है ... बहुत सुन्दर रचना !
बहुत खुबसूरत रचना |
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..
http://charchamanch.blogspot.com/
एक आँचल में
करोड़ों सौगात लिए चलती है
.सही कहा आपने .
हवा , बादल , धूप , छाँव
बच्चों के लिए पूरी प्रकृति
अपने आँचल में समेट
एक धरोहर बन जाती है ...
जब सारी दिशाएं प्रतिकूल होती हैं
माँ लहरों के विपरीत
संभावनाओं के द्वार खोलती है
... माँ शब्द में ही
एक अदृश्य शक्ति होती है
माँ कहते ही
हर विपदा शांत हो जाती है
माँ लोरियों का सिंचन करती है
एक आँचल में
करोड़ों सौगात लिए चलती है
आशीर्वचनों का महाग्रंथ होती है
रश्मि जी इस कविता में एक भी पंक्ति निरर्थक नहीं है यही इसकी सबसे बड़ी सार्थकता है माँ दुनियां की सबसे अनुपम कृति है विधाता का साकार रूप है बधाई |
बहुत ही भावपूर्ण, हृदयस्पर्शी रचना
ये तो मां ही है जिनका अक्षय पात्र कभी रिक्त नहीं होता ......
प्रथम ज्ञान शिशु माँ से पाता ....
जीवन की निर्मात्री है माँ .....
सुकोमल भावों से सजी सुंदर रचना ....!!
pyari rachna.
जीवन का इक जरिया माँ
बोलें तो इक लफ्ज़ फ़क़त
समझें तो सारी दुनिया माँ"
इस बेहद खुबसूरत रचना के लिए नमन...
सादर...
मेहरबानी होगी.
शुक्रिया .
कैसी है प्यासे मन की तमन्ना ,
आज फिर से आँचल में उसकी
छिप जाने का मन करता है
माँ के आँचल के लिए आज
फिर मन ललचा है.....(anju...anu )