औरत तू जननी हे !

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  • Saturday, March 5, 2011
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  • दर्शन कौर धनोय
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  • (माता गुजरी व् बालक गोविंद )


    औरत  तू जननी हे--एक बहन है--एक बेटी है--एक पत्नीहै-- और इन सबसे ऊपर तू एक माँ है--हमारे गुरू गोविंदसिंह जी ने कहा  हे :--

    "एकअच्छी माँ ही एक शूरवीर को जन्म देती हे" 

    यदि माता गुजरी जी न होती तो, 
    गुरु गोविन्दसिंह जी जेसे शूरवीर कहाँ होते ? 

    यदि माँ जिजामाता न होती तो, 
    शिवाजी कैसे  मराठा -पुत्र कहलाते ?

    यशोदा माँ ही थी ,
    जिसने कृष्ण का पालन किया |

    वो देवकी माँ ही थी ,
    जिसने कान्हा को जन्म दिया |

    रानी कोशल्या भी तो माँ थी, 
    जिसकी  कोंख से रघुवीर जन्मे |

    उस कैकई को कैसे भूलू ,
    जिसके वचनों से वनवास गए | 

    वो भी माँ का एक रूप थी ,
    जिसके कारण रावण का संहार हुआ | 

    वो माँ ही थी जिसकी कोंख से ,
    कभी भगत,कभी सुभाष,कभी प्रताप पैदा हुए | 

    वो माँ ही थी ? वो माँ ही है --  
    जिसने हमे सूखे में सुलाया |

    नो माह हमारा बोझा ढोहा,  
    रातो को जागकर,
    हमे तिल -तिल बड़ा किया, 
    हमारी हर ख़ुशी पर अपनी खुशियों को निहाल किया |

    वो माँ ही हे--जो एक मांस के लोथड़े  को, 
    कभी डॉ.,कभी वकील,कभी इंजिनियर बनाती है,
    और इन सबसे ऊपर उसे एक इंसान बनाती है-

    माँ तुझे सलाम !!!      

                                        

    7 comments:

    सदा said...

    इन सबसे ऊपर उसे एक इंसान बनती है-

    वाह ...हर पंक्ति बहुत ही सुन्‍दर भावों को समेटे हुये..मां के बारे में क्‍या कहूं ...जहां ये शब्‍द 'मां' होता है नजरें खुद-ब-खुद वहां ठहर जाती हैं ..बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

    बलबीर सिंह (आमिर) said...

    जहां शब्‍द 'मां' होता है नजरें खुद-ब-खुद वहां ठहर जाती हैं

    शालिनी कौशिक said...

    वो माँ ही हे--जो एक मांस के लोथड़े को,
    कभी डॉ.,कभी वकील,कभी इंजिनियर बनाती है,
    और इन सबसे ऊपर उसे एक इंसान बनाती है
    सराहनीय प्रस्तुति
    http://shalinikaushik2.blogspot.com

    Mohammad Ahmad Haqqani said...

    Nice Post

    Anjana (Gudia) said...

    वो माँ ही हे--जो एक मांस के लोथड़े को,
    कभी डॉ.,कभी वकील,कभी इंजिनियर बनाती है,
    और इन सबसे ऊपर उसे एक इंसान बनाती है-

    sach hai! bahut sunder post!

    DR. ANWER JAMAL said...

    गुमरही की गर्द जम जाए न मेरे चाँद पर
    बारिशे ईमान में यूं रोज़ नहलाती है माँ

    कोई टीपू तो कोई सिकंदर हुआ ,
    कोई कबीर तो कोई क़लंदर हुआ
    हर वुजूद अलग हो चाहे मगर
    हर वुजूद माँ से ही ज़ाहिर हुआ

    निर्मला कपिला said...

    माँ की महिमा अपरम्पार।सुन्दर रचना। शुभकामनायें

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