Skip to main content

तुम होती तो कहती !





जब-जब आंसू भरे आँखों में |
तब-तब कमी तुम्हारी खटकी माँ,
काश ! कि तुम  होती तो कहती ---
मोती व्यर्थ लुटाओ न ----?


                      जब -जब  गायन के सुर साघे |
                      जब -जब तन्मय हो तान उठाई |
                      तब -तब कमी तुम्हारी खटकी माँ,
                      काश ! कि तुम होती तो कहती---
                      इक बार फिर से गाओ न ---?

                                   जब -जब गीत बनाया कोई--|
                            जब-जब सस्वर पाठ किया --|
                                तब-तब कमी तुम्हारी खटकी माँ,
                                 काश ! कि तुम होती तो कहती ---
                            बेटा ,फिर से दोहराओ  न ---?

Comments

माँ जीवन का सम्पूर्ण आधार होती है... प्रेरणा, प्रशंसा , दुलार माँ के पर्यायवाची शब्द हैं
Creative Manch said…
जब-जब आंसू भरे आँखों में |
तब-तब कमी तुम्हारी खटकी माँ,
काश ! कि तुम होती तो कहती ---
मोती व्यर्थ लुटाओ न ----?

बहुत ही सुन्दर
माँ को समर्पित यह रचना बेहद अच्छी लगी
आभार
DR. ANWER JAMAL said…
मेरे बुजुर्गों का साया था जब तलक मुझ पर
मैं अपनी उम्र से छोटा दिखाई देता था

आपकी रचना मैंने अपनी वाइफ़ को पढ़कर सुनाई तो वह बोलीं कि
'इंसान को माँ की जरूरत हर उम्र में रहती है '
सन 1997 में ईद के दिन उनकी वालिदा मोहतरमा का कैंसर की बीमारी से इंतक़ाल हो गया था । उनके 2 छोटी बहनें और एक छोटा भाई है जिसकी वजह से उनके वालिद साहब को 2 महीने बाद ही दिल्ली की एक तलाक़शुदा औरत से शादी करनी पड़ी और फिर वे अपनी बेटी की शादी मुझसे करके वापस Riyadh चले गए। वे पहले से ही वहीं रहते थे और यहाँ केवल अपनी बेटी की शादी करने के लिए आए थे ।
डॉ. सा,आपकी पत्नी ने ठीक कहा हे इन्सान को हर उम्र में माँ की जरूरत पडती हे -- मै जब महज ११ साल की थी तभी मेरी भी माँ का इंतकाल हो गया था -मेरा एक भाई ९ साल का और दूसरा केवल ७ साल का था --हमारे पिता ने दूसरी शादी नही की क्योकि हमारी दादी जिन्दा थी --कुछ साल वो रही हमारे साथ --फिर तो अकेला ही जीवन था बस गुजर गया --पर माँ के बिछोह का जो गम था वो कभी न भर सका न भर सकता हे !
सदा said…
काश ! कि तुम होती तो कहती ---
बेटा ,फिर से दोहराओ न ---?

बहुत ही भावमय करते शब्‍द ।

Popular posts from this blog

माँ बाप की अहमियत और फ़ज़ीलत

मदर्स डे पर विशेष भेंट  इस्लाम में हुक़ूक़ुल ऐबाद की फ़ज़ीलत व अहमियत इंसानी मुआशरे में सबसे ज़्यादा अहम रुक्न ख़ानदान है और ख़ानदान में सबसे ज़्यादा अहमियत वालदैन की है। वालदैन के बाद उनसे मुताल्लिक़ अइज़्जा वा अक़रबा के हुक़ूक़ का दर्जा आता है डाक्टर मोहम्मद उमर फ़ारूक़ क़ुरैशी 1 जून, 2012 (उर्दू से तर्जुमा- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम) दुनिया के हर मज़हब व मिल्लत की तालीमात का ये मंशा रहा है कि इसके मानने वाले अमन व सलामती के साथ रहें ताकि इंसानी तरक़्क़ी के वसाइल को सही सिम्त में रख कर इंसानों की फ़लाहो बहबूद का काम यकसूई के साथ किया जाय। इस्लाम ने तमाम इंसानों के लिए ऐसे हुक़ूक़ का ताय्युन किया है जिनका अदा करना आसान है लेकिन उनकी अदायगी में ईसार व कुर्बानी ज़रूरी है। ये बात एक तरह का तर्बीयती निज़ाम है जिस पर अमल कर के एक इंसान ना सिर्फ ख़ुद ख़ुश रह सकता है बल्कि दूसरों के लिए भी बाइसे राहत बन सकता है। हुक़ूक़ की दो इक़्साम हैं । हुक़ूक़ुल्लाह और हुक़ूक़ुल ऐबाद। इस्लाम ने जिस क़दर ज़ोर हुक़ूक़ुल ऐबाद पर दिया है इससे ये अमर वाज़ेह हो जाता है कि इन हुक़ूक़ का कितना बुलंद मुक़ाम है और उन...

क्या अपाहिज भ्रूणों को मार देने के बाद भी डाक्टर को मसीहा कहा जा सकता है ? 'Spina Bifida'

मेरी बेटी अनम का नाम हिंदी ब्लॉग जगत के लिए एक जाना पहचाना नाम है। हिंदी ब्लॉग जगत में उसकी उम्र के किसी बच्चे का  इतना चर्चा नहीं हुआ, जितना कि उसका हुआ है। यह ठीक वही वक्त है जब हमने अपनी प्यारी अनम को उसके झूले में मृत पाया था। आज से ठीक एक साल पहले 21 और 22 जुलाई की दरम्यानी रात को जब वह सोई तो हम नहीं जानते थे कि सुबह को उसके पालने से जब हम उसे उठाएंगे तो वह हमें एक बेजान लाश की शक्ल में मिलेगी। महज़ 22 दिन इस दुनिया में रहकर वह चल बसी और अच्छा ही हुआ कि वह चल बसी। 'Spina Bifida' की वजह से वह पैदाइशी तौर पर एक अपाहिज बच्ची थी। उसकी दोनों टांगें बेकार थीं। उसके सिर की हड्डियों के बनने में भी कुछ कमी रह गई थी और उसकी रीढ़ की हड्डी भी तिरछी थी। उसकी पैदाइश से पहले जब लेडी डाक्टर मीनाक्षी राना ने उसकी सेहत को जांचने के लिए अल्ट्रा साउंड करवाया तो ये सब बातें उसकी रिपोर्ट में सामने आ गईं। डाक्टर मीनाक्षी ने कहा कि इस बच्ची को पैदा नहीं होने देना है, यह अपाहिज है और आपके किसी काम की नहीं है। हमने पूछा कि यह ज़िंदा तो है न ? उन्होंने कहा कि हां ज़िंदा तो है। तब हमने कहा कि वह ...

माँ The mother (Urdu Poetry Part 2)

हम  बलाओं में कहीं घिरते हैं तो बेइख्तियार ‘ख़ैर हो बच्चे की‘ कहकर दर पे आ जाती है माँ दूर हो जाता है जब आँखों से गोदी का पला दिल को हाथों से पकड़कर घर को आ जाती है माँ दूसरे ही दिन से फिर रहती है ख़त की मुन्तज़िर दर पे आहट हो हवा से भी तो आ जाती है माँ चाहे हम खुशियों में माँ को भूल जाएँ दोस्तो ! जब मुसीबत सर पे आती है तो याद आती है माँ दूर हो जाती है सारी उम्र की उस दम थकन ब्याह कर बेटे की जब घर में बहू लाती है माँ छीन लेती है वही अक्सर सुकूने ज़िंदगी प्यार से दुल्हन बनाकर जिसको घर लाती है माँ हमने यह भी तो नहीं सोचा अलग होने के बाद जब दिया ही कुछ नहीं हमने तो क्या खाती है माँ ज़ब्त तो देखो कि इतनी बेरूख़ी के बावुजूद बद्-दुआ देती है हरगिज़ और न पछताती है माँ अल्लाह अल्लाह, भूलकर हर इक सितम को रात दिन पोती पोते से शिकस्ता दिल को बहलाती है माँ बेटा कितना ही बुरा हो, पर पड़ोसन के हुज़ूर रोक कर जज़्बात को बेटे के गुन गाती है माँ शादियाँ कर करके बच्चे जा बसे परदेस में दिल ख़तों से और तस्वीरों से बहलाती है माँ अपने सीने पर रखे है कायनाते ज़िंदगी ये ज़मीं इस वास्ते ऐ दोस्त कहलाती है...