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आशीष...




माँ के गर्भ मे
अभिमन्यु ने चक्रव्यूह में जाना सीखा
निकलने की कला जाने
उससे पहले , निद्रा ने माँ को आगोश में लिया
भविष्य निर्धारित किया
चक्रव्यूह उसका काल बना !
मेरी आंखें, मेरा मन , मेरा शरीर
मंत्रों की प्रत्यंचा पर जागा है
तुम्हारे चक्रव्यूह को अर्जुन की तरह भेदा है
मेरी आशाओं की ऊँगली थाम कर सो जाओ
विश्वास रखो -
ईश्वर मार्ग प्रशस्त करेंगे

Comments

पहले ही भाग्य का निर्धारण ..अद्भुत सोच ...
हाँ भवितव्यता तो पूर्व निश्चित है और माँ के हाथ सिर्फ आशीष है जो वह अपने बच्चों की झोली में डालती ही रहती है. ये आशीष ही उनके रक्षा कवच बन साथ रहते हैं.
यह विश्वास ही तो साथ चलता है ...
किस तरह जुडती है हमारी संवेदनाएं एक साथ , अपनी पुराणी कविता बहुत याद आ रही है !
सदा said…
मेरी आशाओं की ऊँगली थाम कर सो जाओ
विश्वास रखो -
ईश्वर मार्ग प्रशस्त करेंगे

यही विश्‍वास हरदम साथ रहता है मां का ...।
माँ एक सत्य है जो कभी सोता नहीं है ...
DR. ANWER JAMAL said…
कुछ नहीं होगा तो आंचल में छुपा लेगी
माँ कभी सर पे खुली छत नहीं रहने देगी

Nice post.
Shikha Kaushik said…
bahut sundar bhavabhivyakti.badhai.
Shalini kaushik said…
bahut sundar abhivyakti.
bahut sundar chakraviyu ka varnan--badhai |
Unknown said…
अद्भुत शब्द विन्याश, हमेश की तरह, मर्म्स्पर्ची, हृदयग्राही रचना, धन्यवाद्

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