माँ

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  • Sunday, May 8, 2011
  • by
  • Minakshi Pant
  • in


  • माँ ... कितना एहसास है इसमें ,
    नाम से ही सिरहन हो जाती है |
    कैसे भूले  हम उस माँ को 
    जिसने हमें बनाया है |
    अपना लहू पिला - पिला कर ...
    ये मानुष तन दिलवाया  है |
    उसके प्यारे से स्पंदन ने 
    हमको जीना सिखलाया  है |
    धुप - छाँव के एहसासों  से 
    हमको अवगत करवाया  है |
    हम थककर जब  रुक जाते हैं |
    वो बढकर राह दिखाती   है |
    दुनियां के सारे रिश्तों से 
    हमको परिचित  करवाती है |
    जब कोई साथ न रहता  है |
    वो साया  बन साथ निभाती है |
    खुद सारे दुख अपने संग ले जाकर 
    हमें सुखी कर जाती है |
    बच्चों की खातिर वो...
    दुर्गा - काली भी बन जाती है |
    बच्चों के चेहरे में ख़ुशी देख ,
    अपना जीवन सफल बनाती है |
    उसके जैसा रिश्ता अब तक 
    दुनियां में न बन पाया है  |
    कितना भी कोई जतन करले 
    उसके एहसानों से उपर न उठ पाया है  |
    ऊपर वाले ने भी सोच - समझ कर 
    हमको प्यारी माँ का उपहार दिलाया है |

    4 comments:

    निर्मला कपिला said...

    बहुत सुन्दर। माँ भगवान का दूसरा रूप है। जो अपने बच्चों को बिना स्वार्थ इतना प्यार देती है पालती है। हैपी मदर्ज़ डे।

    सदा said...

    वाह ...बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने ।

    DR. ANWER JAMAL said...

    उसके जैसा रिश्ता अब तक
    दुनियां में न बन पाया है |

    sach kaha .

    दर्शन कौर धनोए said...

    उसके जैसा रिश्ता अब तक दुनिया मै न बन पाया है ...न बन पाएगा ..कभी ?

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