माँ

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  • Sunday, April 17, 2011
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  • sadhana vaid
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  • रात की अलस उनींदी आँखों में
    एक स्वप्न सा चुभ गया है ,
    कहीं कोई बेहद नर्म बेहद नाज़ुक ख़याल
    चीख कर रोया होगा ।

    सुबह के निष्कलुष ज्योतिर्मय आलोक में
    अचानक कालिमा घिर आयी है ,
    कहीं कोई चहचहाता कुलाँचे भरता मन
    सहम कर अवसाद के अँधेरे में घिर गया होगा ।

    दिन के प्रखर प्रकाश को परास्त कर
    मटियाली धूसर आँधी घिर आई है ,
    कहीं किसी उत्साह से छलछलाते हृदय पर
    कुण्ठा और हताशा का क़हर बरपा होगा ।

    शिथिल शाम की अवश छलकती आँखों में
    आँसू का सैलाब उमड़ता जाता है ,
    कहीं किसी बेहाल भटकते बालक को
    माँ के आँचल की छाँव अवश्य मिली होगी ।

    साधना वैद

    7 comments:

    संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

    माँ हर तपिश से बचा लेती है ..बहुत अच्छी प्रस्तुति ...

    Minakshi Pant said...

    khubsurat rachna

    रश्मि प्रभा... said...

    maa to bas maa hai...

    वाणी गीत said...

    माँ का आँचल ऐसा ही है !

    वन्दना said...

    ्बहुत सुन्दर भाव्।

    वीना said...

    कहीं किसी बेहाल भटकते बालक को
    माँ के आँचल की छाँव अवश्य मिली होगी ।

    काश कि कोई भी मां के आंचल की छांव से महरूम न हो.....
    बहुत सुंदर रचना....

    DR. ANWER JAMAL said...

    Nice post.

    दुनिया की रस्मों से अनजान
    मैं हूँ पागल , मैं हूँ नादान .

    बंदिशें इस कद्र भारी पड़ी
    दिल में दफन हो गए सब अरमान.

    कर्जदार हूँ , बकाया हैं मुझ पर
    कुछ इसके , कुछ उसके अहसान .

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