बेसहारा होते मां-बाप

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  • Friday, April 15, 2011
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  • HAKEEM YUNUS KHAN
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  • ‘‘दुनिया से मिली न वफाएं तो क्या गम था,
    हसरतें रही अधूरी तो क्या गम था,
    रूसवाईयां तो तब हुई जब अपनों ने ही ठुकरा दिया,
    वरना कभी हम भी खुशनसीब थे,
    हमें भी क्या गम था।’’
    आंखों में आंसू, चेहरे में बेबसी लिये कुछ यूं ही अपने दिल का दर्द बयां कर रहे हैं आज के बुजुर्ग। जिन्हें वक्त की मार ने तो कम बल्कि अपनों के तिरस्कार ने ज़्यादा रूलाया है। ये बूढ़े मां-बाप जिन्होंने कभी अपने बच्चों में बुढ़ापे की लाठी तलाशी थी, आज इन्हीं बच्चों ने उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने के लिए बेसहारा छोड़ दिया है।
    वैसे कहते है माता-पिता का दर्जा भगवान से भी बढ़कर होता हैं। शायद तभी किसी ने कहा भी है,‘‘धरती पर रहने वाले भगवान यानि माता-पिता को खुश कर लिया तो स्वर्ग में बैठे भगवान अपने आप ही खुश हो जायेंगे।’’ जब माता-पिता ईश्वर से भी बढ़कर है फिर क्यों हमें ऐसे असहाय बुजुर्ग देखने को मिलते हैं जिन्हें उनके बच्चों ने ही धुतकार दिया? क्या इन बच्चों को याद नहीं जब वो छोटे थे तो किसने उन्हें उंगली पकड़कर चलना सिखाया था? और किसने उनके मुंह में निवाला डाला था? हां ये वहीं मां-बाप है जिन्होंने तुम्हारी खुशियों के लिए अपने गम को भुला दिया। तुम्हारी एक मुस्कुराहट के लिए अपना सारा दर्द छिपा लिया। तुम्हारी ख्वाहिषें अधूरी न रह जायें, उन्होंने अपनी हसरतों का गला घोंट दिया। महज़ इस उम्मींद में के जब वो बूढ़े होंगे तब तुम उनका सहारा बनोगे।
    याद है बचपन में तुम जब मेले में खिलौना लेने की जिद करते थे और बाबू जी अपनी शर्ट के जेब में हाथ डाल कर देखते थे कि अरे, इसमें तो सिर्फ बीस का नोट पड़ा हुआ हैं। और इसी रूपये से उन्हें घर के लिए सब्जी भी ले जानी है। मगर तुम्हारी उस छोटी सी जिद को पूरा करने के लिए उन्होंने अपनी जरूरतों से समझौता कर लिया और तुम्हें वो खिलौना खरीद कर दे दिया। पता है उस वक्त तुम्हारी उस मीठी-सी मुस्कान को देख बाबू जी अपने सारे दुख भूल गये थे। लेकिन आज तुम जब महीने में दस हजार रूपये कमा रहे हो फिर भी क्या तुम्हारे लिए बाबू जी का एक टूटा चश्मा बनवाना इतना मंहगा हो गया? क्या उनका ये चश्मा तुम्हारे उस खिलौने से ज़्यादा कीमती है? हाय रे ये ज़ालिम दुनिया, जिसमें पैसों की खातिर एक बेटे ने अपने पिता के अरमानों को रौंद दिया।
    ये तो दुर्दशा उस पिता की थी जिसकी भावनाओं के सामने उनके बेटे का अड़ियल रव्वैया भारी पड़ गया। मगर उस मां की ऐसी दशा सुनने से तो आपका कलेजा ही छलनी हो जायेगा। वही मां जिसने निस्वार्थ भाव से तेरी देखभाल की। रात-रात जाग कर तुझे सुलाया। खुद भूखी रह कर तुझे खिलाया। तेरी आंखों में आंसू न हो इसलिए तुझे हंसाया। लेकिन उस मां को क्या पता था कि जिस कलेजे के टुकड़े को वो अपनी जान से भी ज़्यादा चाहती हैं आज वही उसे यूं बेसहारा छोड़ देगा। उस मां को छोड़ देगा जिसने न जाने तेरी कितनी फरमाईषों को पलक झपकते पूरा किया होगा। आज उस मां ने बुढ़ापे की दहलीज़ पर कदम क्या रखा वो तेरे लिए बोझ बन गयी? क्या अब वो तेरे लिए एक बेकार की कोने में पड़ी रहने वाली चीज़ हो गयी है? माना आज तेरा अपना रूतबा है, शान-शौकत है, मगर ये तुझे मिली कैसे? इन्हीं मां-बाप के आशीर्वाद से। उनके त्याग से। ये आज भी तेरे माता-पिता है और तू उनकी आंखों का तारा। समय के साथ उनका प्यार तेरे लिए कभी कम नहीं हुआ है। लेकिन वक्त के साथ शायद तू बहुत बदल गया हैं। अपनी झूठी इज्ज़त के सामने आज तुझे अपने माता-पिता बोझ लगने लगे हैं जिसे तू अब और नहीं ढ़ोना चाहता। इसलिए तूने उन्हें वृृद्धाश्रम में रहने को मजबूर कर दिया न?
    ये वाक्या महज़ कुछ बुजुर्गों का नहीं हैं बल्कि आजकल ऐसे बूढ़े मां-बाप की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है जिन्हें उनके बच्चों ने ही घर से बाहर निकाल दिया। शायद आज इन बच्चों के लिए माता-पिता की भावनाओं से ज़्यादा उनका रूतबा प्यारा हैं।
    शुक्रिया के साथ, मुआशरे में सही रुझान को बढ़ावा देने के लिए  

    4 comments:

    दर्शन कौर धनोए said...

    "आजकल ऐसे बूढ़े मां-बाप की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है जिन्हें उनके बच्चों ने ही घर से बाहर निकाल दिया। शायद आज इन बच्चों के लिए माता-पिता की भावनाओं से ज़्यादा उनका रूतबा प्यारा हैं।"

    आपने ठीक फरमाया जनाब !आज इनकी संख्या में रोज बढोतरी होती जा रही है --बड़े शहरों में ये तादाद कुछ ज्यादा ही है --
    क्यों नही समझते की कल जिन्होंने हमे हाथ पकड़कर चलना सिखाया --आज उन्हीको हम बेसहारा छोड़ रहे है --ऐसे मामले ज्यादातर लड़के की शादी के बाद ही सामने आते है --क्यों एक लड़की अपना घर छोड़ कर जब दुसरे घर में आती है तो पति के साथ -साथ उसके माँ -बाप को अपना नही पाती --जहां यह समस्या नही होती ,वहाँ सारा परिवार हंसी ख़ुशी से रहता है --

    हम माँ की यह नैतिक जुमेदारी है की वो अपनी बेटी को यह संस्कार दे की आज से वो घर तेरा है और आज से वही तेरे माता -पिता है --
    हो सकता है की इस कारण इस समस्या का हल मिल जाए --ताकि कोई बुजुर्ग फिर अपने घर से यु निष्कासित न हो --
    एक सार्थक पोस्ट के लिए धन्यवाद सर !

    krati said...

    कड़वा पर सच |

    DR. ANWER JAMAL said...

    @ Krati ji ! Thanks for your comming.
    आपके ब्लॉग का लिंक 'मुशायरा' पर लगाया गया .
    आप चाहें तो आप भी इसमें शामिल हो सकती हैं .
    http://mushayera.blogspot.com/

    DR. ANWER JAMAL said...

    बहुत अफसोसनाक हालात हैं .
    http://pyarimaan.blogspot.com/2011/04/226.html

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