जब भी मां ....

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  • Saturday, April 2, 2011
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  • सदा
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  • टूटी खाट पर

    जब भी मां

    मैं तेरा बिस्‍तर लगाता हूं

    मेरी पीठ

    दर्द से दुहरी हो जाती है ।

    मैं समेटता हूं

    सपनों को बन्‍द करके आंखों को

    जब भी

    गरम आंसुओं की

    कुछ बूंदे

    तेरा दामन भिगो जाती हैं ।

    एक सिहरन पूरे शरीर में होती है,

    जब तेरी झुकी कमर

    टेककर लाठी

    मेरे लिये खेतों पे रोटी लाती है ।

    4 comments:

    रश्मि प्रभा... said...

    एक सिहरन पूरे शरीर में होती है,
    जब तेरी झुकी कमर
    टेककर लाठी
    मेरे लिये खेतों पे रोटी लाती है...
    tera yahi pyaar meri himmat ban jati hai , kai sapne de jati hai

    वन्दना said...

    बेहद मर्मस्पर्शी।

    DR. ANWER JAMAL said...

    एक सच्चाई बिल्कुल सादा ज़ुबान में ।
    शुक्रिया !

    Roshi said...

    kya khoob likha hai 'maa ka mukablo koi nahi kar sakta hai

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