माँ The mother (Urdu Poetry Part 2)

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  • Friday, March 25, 2011
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  • DR. ANWER JAMAL
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  • हम  बलाओं में कहीं घिरते हैं तो बेइख्तियार
    ‘ख़ैर हो बच्चे की‘ कहकर दर पे आ जाती है माँ

    दूर हो जाता है जब आँखों से गोदी का पला
    दिल को हाथों से पकड़कर घर को आ जाती है माँ

    दूसरे ही दिन से फिर रहती है ख़त की मुन्तज़िर
    दर पे आहट हो हवा से भी तो आ जाती है माँ

    चाहे हम खुशियों में माँ को भूल जाएँ दोस्तो !
    जब मुसीबत सर पे आती है तो याद आती है माँ

    दूर हो जाती है सारी उम्र की उस दम थकन
    ब्याह कर बेटे की जब घर में बहू लाती है माँ

    छीन लेती है वही अक्सर सुकूने ज़िंदगी
    प्यार से दुल्हन बनाकर जिसको घर लाती है माँ

    हमने यह भी तो नहीं सोचा अलग होने के बाद
    जब दिया ही कुछ नहीं हमने तो क्या खाती है माँ

    ज़ब्त तो देखो कि इतनी बेरूख़ी के बावुजूद
    बद्-दुआ देती है हरगिज़ और न पछताती है माँ

    अल्लाह अल्लाह, भूलकर हर इक सितम को रात दिन
    पोती पोते से शिकस्ता दिल को बहलाती है माँ

    बेटा कितना ही बुरा हो, पर पड़ोसन के हुज़ूर
    रोक कर जज़्बात को बेटे के गुन गाती है माँ

    शादियाँ कर करके बच्चे जा बसे परदेस में
    दिल ख़तों से और तस्वीरों से बहलाती है माँ

    अपने सीने पर रखे है कायनाते ज़िंदगी
    ये ज़मीं इस वास्ते ऐ दोस्त कहलाती है माँ

    साल भर में या कभी हफ़्ते में जुमेरात को
    ज़िंदगी भर का सिला इक फ़ातिहा पाती है माँ

    गुमरही की गर्द जम जाए न मेरे चाँद पर
    बारिशे ईमान में यूँ रोज़ नहलाती है माँ

    अपने पहलू में लिटाकर रोज़ तोते की तरह
    एक बारह, पाँच, चैदह हमको रटवाती है माँ

    उम्र भर ग़ाफ़िल न होना मातमे शब्बीर से
    रात दिन अपने अमल से हमको समझाती है माँ

    मरतबा माँ का हो ज़ाहिर इसलिए फ़िरदौस से
    अपने बच्चों के लिए पोशाक मंगवाती है माँ

    याद आता है शबे आशूर को कड़ियल जवाँ
    जब कभी उलझी हुई ज़ुल्फ़ों को सुलझाती है माँ

    सबसे पहले जान देना फ़ातिमा के लाल पर
    रात भर औनो मुहम्मद को ये समझाती है माँ

    जब तलक ये हाथ हैं , हमशीर बेपरदा न हो
    इक बहादुर बावफ़ा बेटे से फ़रमाती है माँ

    नौजवाँ बेटा अगर दम तोड़ दे आग़ोश में
    ज़िंदगी भर सर को दीवारों से टकराती है माँ

    फ़ातिमा के लाल पर कुरबान करने के लिए
    बाँध कर सेहरा जवाँ बेटे को ले आती है माँ

    ख़ून में डूबे हुए आते हैं जब सेहरे के फूल
    एक इक टुकड़े को अपने दिल से लिपटाती है माँ

    लाशे क़ासिम पे कहा ज़िंदा रही तो आऊँगी
    अब तो सूए शाम दुल्हन को ले जाती है माँ

    लाश पर बेटे की पढ़ती है जवानी मरसिया
    शुक्र का सज्दा इस आलम में बजा लाती है माँ

    अल्लाह अल्लाह इत्तिहादे सब्र ए लैला व हुसैन
    बाप ने खींची सिनाँ, सीने को सहलाती है माँ

    ये बता सकती है हमको बस रबाबे ख़स्ता तन
    किस तरह बिन दूध के बच्चे को बहलाती है माँ

    भेजकर बच्चे को तीरों में सुकूने क़ल्ब से
    फिर शहादत के लिए दामन को फैलाती है माँ

    दे के अपने लाल को इस्लाम की आग़ोश में
    गोद ख़ाली फिर सूए जन्नत पलट जाती है माँ

    गर सुकूने ज़िंदगी घिर जाए फ़ौजे ज़ुल्म  में
    छोड़कर फ़िरदौस को मक़तल  में आ जाती है माँ

    शिम्र के ख़ंजर से या सूखे गले से पूछिए
    ‘माँ‘ इधर मुंह से निकलता है उधर आती है माँ

    ऐसा लगता है किसी मक़्तल से अब भी वक्ते अस्र
    इक बुरीदा सर से ‘प्यासा हूँ‘ सदा आती है माँ

    अपने ग़म को भूलकर रोते हैं जो शब्बीर को
    उनके अश्कों के लिए जन्नत से आ जाती है माँ

    जिनको पाला था पराये घर पका कर रोटियाँ
    उफ़ उन्हीं बच्चों पे इक दिन बोझ बन जाती है माँ

    डिग्रियाँ दिलवाईं जिनको, अपने अरमाँ बेचकर
    अब उन्हीं की बीवियों की झिड़कियाँ खाती है माँ

    दश्ते गुरबत में तयम्मुम करके जलती रेत पर
    ज़िंदगी की लाश को ज़ख्मों से कफ़नाती है माँ

    बेकसी ऐसी हो, कि इक बूंद पानी भी न हो
    आँसुओं पर फ़ातिहा बच्चों को दिलवाती है माँ

    सब को देती है सुकूँ और ख़ुद ग़मों की धूप में
    रफ़्ता रफ़्ता बर्फ़ की सूरत पिघल जाती है माँ

    उम्र भर रखे रही सर पर ज़रूरत का पहाड़
    थक गईं साँसें तो अब आराम फ़रमाती है माँ

    जो ज़बाँ पर भी न आए, दिल में घुट कर रह गए
    ऐसे कुछ अरमाँ अपने साथ ले जाती है माँ

    जिस को पढ़ने के लिए बच्चों को फुर्सत ही नहीं
    एक दिन वो अजनबी तारीख़ बन जाती है माँ

    शायर - रज़ा सिरसवी, किताब- माँ

    शब्दार्थ
    मुंतज़िर-प्रतीक्षारत, ज़ब्त-क़ाबू , शिकस्ता दिल-टूटा हुआ दिल,
    मरतबा-पद, हैसियत, रूतबा; औनो मुहम्मद- औन और मुहम्मद, इमाम हुसैन की बहन जनाबे ज़ैनब के बेटे  , 
    फ़ातिमा का लाल-इमाम हुसैन, हमशीर-बहन,
    सिनाँ-भाला,
    रबाब ए ख़स्ता तन-कमज़ोर बदन वाली रबाब (इमाम हुसैन की पत्नी)
    सूए शाम-मुल्क शाम की दिशा की तरफ़,
    इत्तिहादे सब्र ए लैला व हुसैन-इमाम हुसैन और उनकी पत्नी उम्मे लैला के सब्र का एक हो जाना
    सूकूने क़ल्ब-दिल का सुकून, सदा-आवाज़, मक़्तल-क़त्ल किए जाने की जगह
    दश्ते गुरबत-अजनबी रेगिस्तान, वक्ते अस्र-अस्र की नमाज़ के वक़्त  
    शिम्र-इमाम हुसैन का क़ातिल (वाक़या ए करबला);
    इस नज़्म में उम्मे लैला, रबाब और ज़ैनब जैसी उन पाक माँओं की कुरबानियों का भी ज़िक्र है जिनके बयान के लिए कई किताबें भी कम हैं। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझे बिना इन शेरों का अर्थ नहीं समझा जा सकता। जो लोग इस नज़्म को सही तौर पर समझना चाहते हैं, उनके लिए ज़रूरी है कि वे ‘वाक़या ए करबला‘ में कुरबानी देने वालों के बारे में जानकारी हासिल करें।


    भाग -१ 'माँ' The mother

    18 comments:

    akhtar khan akela said...

    anvr bhaai maan ke aejaaz men aapne jo kuchh bhi sch likhaa he in dinon jb maan ki ahmiyt log km krte jaa rhe hen aek sikh dene vaali rchna he ise hm sjo kar rkhenge . mubark ho . akhtar khan akela kota rajsthan

    Shah Nawaz said...

    बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल है... जितनी भी तारीफ करूँ कम है...

    रज़ा सिरसवी साहब से यह बेहतरीन मुलाक़ात कराने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया...

    दर्शन कौर धनोए said...

    अनवरजी, बहुत जीवित गजल है- उर्दू का ज्यादा ज्ञान नही है फिर भी कर्बला की बहुत -सी कहानिया सुनी है --फुर्सत में दुबारा वो कहानिया पडूँगी--

    वेसे इंदौर मे कर्बला मैदान के पास ही मेरे पिताजी के धनिष्ट दोस्त सिद्धिकी साहेब रहते थे --बचपन में हम उनके साथ कर्बला मैदान जाया करते थे हम बच्चे यह देख कर दंग रह जाते थे की कैसे ये लोग अंगारों पर चलते है -उसी समय आपा जो उनकी बड़ी बेटी थी उनके ही मुख से कुछ कहानिया सुनी थी जो आज भी याद है !धन्यवाद

    रश्मि प्रभा... said...

    अपने सीने पर रखे है कायनाते ज़िंदगी
    ये ज़मीं इस वास्ते ऐ दोस्त कहलाती है माँ
    khuda ki khudaai hoti hai maa

    afsarpathan said...

    जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
    माँ दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है
    ये ऐसा कर्ज है की जो में अदा कर ही नहीं सकता
    में जब यक घर न लौटू मेरी माँ सजदे में रहती है

    ऐ अँधेरे देख ले, मुह तेरा कला हो गया
    माँ ने आखे खोल दी, घर में उजाला हो गया

    अभी जिन्दा है माँ मेरी, मुझे कुछ भी नहीं होगा,
    में घर से जब निकलता हु, दुआ भी साथ चलती है

    मुनव्वर माँ के आगे यु कभी खुलकर नहीं रोना,
    जहा बुनियाद हो , इतनी नमी अच्छी नहीं होती
    - मुनव्वर राणा
    kya kahun aapki nazar munawwar rana saheb ki ye nazm.
    kafi jandaar rachna hai.
    thnx

    DR. ANWER JAMAL said...

    आदर्श माँ बाप की बेमिसाल कुरबानियाँ
    @ बहन दर्शन कौर जी ! इस ज़मीन पर इंसान की ज़िंदगी का वुजूद माँ और बाप की वजह से है। ये लोग सिर्फ़ बदन को ही इस दुनिया में नहीं लाते बल्कि उसकी परवरिश भी करते हैं और इससे भी ज़्यादा यह कि उसके मन और बुद्धि को भी इल्म की रौशनी से रौशन करते हैं। वे अपने बच्चों को जीने का सही तरीक़ा सिखाते हैं। ये माँ बाप अच्छे माँ बाप कहलाते हैं और ये अच्छे माँ बाप तब बनते हैं जब ये आदर्श माँ बाप के उसूलों और क़ायदों का अनुसरण करते हैं।
    आदर्श माँ बाप वे होते हैं जो अपने बच्चों को सही तरीक़े से केवल जीना ही नहीं बल्कि सही मक़सद के लिए और सही तरीक़े से कुरबान होना भी सिखाते हैं। ये लोग ही ज़िंदगी के सच्चे मक़सद को जानने वाले और पाने वाले होते हैं। ऐसे आदर्श माँ बाप ज़मीने के हर इलाक़े और हर दौर में हुए हैं लेकिन उनके इतिहास में लोगों ने अपनी तरफ़ से इतनी कहानियाँ मिला दी हैं कि आज उनका अनुसरण करना किसी के लिए संभव नहीं रह गया है। वाक़या ए करबला के शहीदों की माँओं और बापों का इतिहास आज भी सुरक्षित है और इंसान चाहे तो आज भी वह अपने हरेक सवाल का जवाब उनकी ज़िंदगियों से पा सकता है। उनकी बेमिसाल कुरबानियाँ उनकी सच्चाई का ज़िंदा सुबूत हैं। सच आज सबके सामने है, जो पाना चाहे इसे आसानी से पा सकता है।
    विश्व विख्यात उर्दू शायर जनाब रज़ा सिरसवी साहब ने अपनी नज़्म ‘माँ‘ में उनकी कुरबानियों को पेश करके हमारे लिए उनके बारे में जानना और भी ज़्यादा आसान कर दिया है, इसके लिए हम उनके शुक्रगुज़ार हैं।
    आपका भी शुक्रिया !
    उनकी शहादत के दिन आलिम लोग उनकी कुरबानियों को याद करते हैं और उनके उसूलों को लोगों के सामने रखते हैं और कम इल्म लोगों को उन कामों से रोकते हैं जो कि दीन में जायज़ नहीं है जैसे कि कुछ लोग शहीदाने करबला की मुहब्बत में और उन पर तोड़े गए सितम के ग़म में संतुलित व्यवहार से हट जाते हैं और कोई आग पर चलता है और कोई खुद को छुरियाँ मार कर ज़ख्मी करने लगता है। आलिम लोग उन्हें आज भी रोकते हैं लेकिन वे नादान ही क्या , जो किसी के रोकने से रूक जाएं। ये बातें लोगों ने अपनी तरफ़ से बढ़ा ली हैं। इन्हें नज़रअंदाज़ करते हुए हमें अपनी नज़र उन उसूलों पर क़ायम रखनी चाहिए जिनकी तालीम उन माँओं और बापों ने दी, जिन्होंने हमें करबला के मैदान में अपने अमल से जीने और मरने का सही तरीक़ा सिखाया।

    Neelam said...

    बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल है... जितनी भी तारीफ करूँ कम है.

    Sadhana Vaid said...

    माँ की शान में इससे बेहतर गज़ल आज तक नहीं पढ़ी ! पहले सोच रही थी किसी खास शेर को अपनी टिप्पणी में उद्धृत करूँगी ! लेकिन सभी एक से बढ़ कर एक हैं ! इतनी कमाल की रचना के लिये मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें !

    Bhushan said...

    माँ की छवि लफ़्ज़ों की मोहताज नहीं होती. लफ़्ज़ माँ के मोहताज लगते हैं. बहुत सुंदर रचना.

    सदा said...

    आपकी यह रचना कालजयी है ...बहुत ही भावमय करते शब्‍द दिये हैं आपने हर पंक्ति में जो कि अनुपम बन पड़े हैं ...बहुत-बहुत आभार इस बेहतरीन प्रस्‍तुति के लिये ।

    RameshGhildiyal"Dhad" said...

    "sub ko deti hai sukun au khud gamon ki dhoop mein..
    Rafta, rafta barf ki surat pighal jaati hai maan" aaj ke haalat yahi hain dost.."Biviyon ki jhidkiyan khatihai maan"...aur kaam se laute hue bachche ko dukh na ho, apne aansuon ko p jati hai maan. sikiyan goonji hai chehre ki lakeeron me, kampkanpate gue honto ko see jati hai maan......... aur kamzor beta ......basss......rahne do yaar khuda quassam rula diya..

    रज़िया "राज़" said...

    मांगती ही कुछ नहीं अपने लिए अल्लाह से ।
    अपने बच्चों के लिए दामन फ़ैलाती है माँ ॥
    कांपती आवाज़ से कहती है "बेटा अलविदा" ।
    सामने जब तक रहे हाथों को लहराती है मां ॥
    बाद मर जाने के फिर बेटे कि खिदमत के लिये ।
    भेस बेटी का बदल कर आ जाती है मां ॥
    रूह के रिश्ते की ये गहराईयां तो देखिये ।
    चोट लगती है हमें और चिल्लाती है माँ ॥
    डो.जमालसाहब ! आज इस विश्व विख्यात उर्दू शायर जनाब रज़ा सिरसवी साहब के माँ पर लिखे अशाअर ने आख़ों को नम कर दिया।
    बहोत बहोत शुक्रिया।

    शिखा कौशिक said...

    बेटा कितना ही बुरा हो, पर पड़ोसन के हुज़ूर
    रोक कर जज़्बात को बेटे के गुन गाती है माँ-
    bahut khoob ..

    एस.एम.मासूम said...

    एक बेहतरीन नज़्म पेश कि है आप ने अनवर भाई , शायद अब तक कि माँ पे कही गयी सबसे बेहतरीन नज़्म है यह.कर्बला कि माएं और उनकी क़ुरबानी पे जल्द लिखूंगा

    DR. ANWER JAMAL said...

    @ जनाब मासूम साहब ! यह आपने अच्छी ख़बर दी है कि इस नज़्ममें जिन आला किरदार माँओं का ज़िक्र है , उनके बारे में आप एक पोस्ट बनाकर जानकारी देंगे। आपकी उस पोस्ट को हम अपने इस ब्लॉग पर ज़रूर लगाना चाहेंगे।
    शुक्रिया।

    @ बहन रज़िया साहिबा ! आपका आना और सराहना अच्छा लगा।
    शुक्रिया।

    DR. ANWER JAMAL said...

    @ रश्मि प्रभा जी, सदा जी, दर्शन कौर जी, शिखा जी, नीलम जी, भूषण जी, रमेश जी, शाहनवाज़ भाई, अफ़सर भाई और अख़तर भाई ! आप सभी के जज़्बात वाक़ई क़ाबिले क़द्र हैं। अच्छी बातें जितनी ज़्यादा बार दोहराई जाती हैं , वे उतनी ही ज़्यादा देर तक हमारे दिमाग़ में क़ायम रहती हैं और समाज में हमारी वही सोच ज़ाहिर भी होती है।
    मैं आपसे इल्तिजा करूंगा कि आप अपने ब्लॉग पर इस ब्लाग ‘प्यारी माँ‘ का लिंक ज़रूर दें और जिन बहनों का ब्लॉग इस ब्लॉग पर जुड़ने से रह गया है, बराय मेहरबानी वे अपने ब्लॉग का लिंक या अपने पसंदीदा ब्लॉग का लिंक ज़रूर ज़रूर दे दें।
    शुक्रिया !

    DR. ANWER JAMAL said...

    साधना जी भी ‘प्यारी माँ‘ के खि़दमतगारों में आज शामिल हो गई हैं। उनका नाम भी आज से इस ब्लॉग पर चमकेगा और हमें उनकी बेहतरीन रचनाएं पढ़ने को मिलेंगी। यह हमारे लिए बेहद ख़ुशी की बात है।
    हम उनका तहे दिल से स्वागत करते हैं।
    सुस्वागतम् !
    खुश आमदीद !!

    Anjana (Gudia) said...

    मरही की गर्द जम जाए न मेरे चाँद पर
    बारिशे ईमान में यूँ रोज़ नहलाती है माँ

    Anwar Bhai, Salaam! itni khoobsurat nazm pehli baar padi, aankhen bhar gayi!

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