माँ बाप की अहमियत और फ़ज़ीलत

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  • Monday, May 12, 2014
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  • DR. ANWER JAMAL
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  • मदर्स डे पर विशेष भेंट 
    इस्लाम में हुक़ूक़ुल ऐबाद की फ़ज़ीलत व अहमियत
    इंसानी मुआशरे में सबसे ज़्यादा अहम रुक्न ख़ानदान है और ख़ानदान में सबसे ज़्यादा अहमियत वालदैन की है। वालदैन के बाद उनसे मुताल्लिक़ अइज़्जा वा अक़रबा के हुक़ूक़ का दर्जा आता है
    डाक्टर मोहम्मद उमर फ़ारूक़ क़ुरैशी
    1 जून, 2012
    (उर्दू से तर्जुमा- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)
    दुनिया के हर मज़हब व मिल्लत की तालीमात का ये मंशा रहा है कि इसके मानने वाले अमन व सलामती के साथ रहें ताकि इंसानी तरक़्क़ी के वसाइल को सही सिम्त में रख कर इंसानों की फ़लाहो बहबूद का काम यकसूई के साथ किया जाय। इस्लाम ने तमाम इंसानों के लिए ऐसे हुक़ूक़ का ताय्युन किया है जिनका अदा करना आसान है लेकिन उनकी अदायगी में ईसार व कुर्बानी ज़रूरी है।
    ये बात एक तरह का तर्बीयती निज़ाम है जिस पर अमल कर के एक इंसान ना सिर्फ ख़ुद ख़ुश रह सकता है बल्कि दूसरों के लिए भी बाइसे राहत बन सकता है। हुक़ूक़ की दो इक़्साम हैं । हुक़ूक़ुल्लाह और हुक़ूक़ुल ऐबाद। इस्लाम ने जिस क़दर ज़ोर हुक़ूक़ुल ऐबाद पर दिया है इससे ये अमर वाज़ेह हो जाता है कि इन हुक़ूक़ का कितना बुलंद मुक़ाम है और उनकी अदमे अदाइगी किस तरह अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की नाराज़गी का सबब बन सकती है।
    इस्लामी तालीमात की रू से बंदों के हुक़ूक़ की अदायगी इस्लामी नज़्मे इबादत का लाज़िमी जुज़ है और उन हुक़ूक़ से आराज़ व पहलू तही एक तरफ़ तो मुआशरे के बिगाड़ का सबब बन सकता है और दूसरी तरफ़ अल्लाह की नाराज़गी का सबब। लिहाज़ा बहैसियत मुसलमान हमें हुक़ूक़ुल ऐबाद की तरफ़ ज़्यादा तवज्जोह देनी चाहीए।
    इस्लाम एक ऐसा दीन है जो ख़ैरो बरकत और अमन व सलामती से इबारत है। इसमें अपने पराए, वाक़िफ़ नावाक़िफ़, बड़े छोटे, हाकिम मह्कूम, औरत मर्द, हर एक के हुक़ूक़ का ना सिर्फ ये कि एहतिमाम किया गया है बल्कि उनकी अदायगी को इबादत क़रार दिया गया है। इसलिए इस्लाम आलमे इंसानियत के लिए पाँच चीज़ों के तहफ़्फ़ुज़ औऱ निगेहदाश्त की ज़मानत फ़राहम करता है। हिफ़्ज़े नफ़स, हिफ़्ज़े माल, हिफ़्ज़े अर्ज़, हिफ़्ज़े दीन और हिफ़्ज़े नस् । उन पर ग़ौर करने से मालूम होगा कि इस्लाम इंसान की जान और उसके माल, उसकी इज़्ज़त, उसके दीन और उसकी नस्ल की हिफ़ाज़त का बहुत एहतेमाम करता है। लिहाज़ा हुक़ूक़ुल्लाह के बाद जब हम हुक़ूक़ुल ऐबाद की बात करते हैं तो इसमें एक इंसान पर दूसरे इंसान की इन पाँच चीज़ों की हिफ़ाज़त लाज़िम आती है।
    इंसानी मुआशरत में सबसे ज़्यादा अहम रुक्न ख़ानदान है और ख़ानदान में सबसे ज़्यादा अहमियत वालदैन की है। वालदैन के बाद उनसे मुताल्लिक़ अइज़्जा व अक़रबा के हुक़ूक़ का दर्जा आता है। इसके बाद जैसे जैसे इंसानी मुआशरे के ताल्लुक़ात वसीअ होते जाते हैं, वैसे वैसे इंसान आफ़ाक़ी हो जाता है और कायनात में मौजूद तमाम मख़लूक़ात से उसके ख़ुशगवार ताल्लुक़ात की इब्तेदा होती है। हर एक के लिए जो कम से कम हक़ है वो मीठा बोल है।
    तमाम तब्क़ात में से हर एक के हुक़ूक़ की तवील फ़ेहरिस्त तैय्यार हो सकती है लेकिन सबसे ज़्यादा जिस बात पर ज़ोर दिया गया है वो क़ौले करीम और क़ौले मारूफ़ है। अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने वाल्दैन के साथ हुस्ने सुलूक और एहसान के साथ जिस तफ़्सील का ज़िक्र किया है इसमें ज़बान को बुनियादी हैसियत हासिल है चुनांचे इरशाद फ़रमाया हैः इन दोनों (वालदैन) में से किसी को भी उफ़ तक ना कहो। बल्कि उनसे अच्छी बात कहो। इन आयात की तालीमात पर ग़ौर फ़रमाएं।
    पहले जिन दो बातों से मना किया गया है उनका ताल्लुक़ ज़बान ही से है। ज़बान से वाल्दैन को उफ़ तक ना कहो, उन्हें सख़्त अलफ़ाज़ में झिड़को भी नहीं। इसके बरख़िलाफ़ हुक्म ये हो रहा है कि इनके साथ नरमी से गुफ़्तुगु करो। गुफ़्तुगु करो। नरमी भी ऐसी जिससे रहमत व शफ़्क़त ,मोहब्बत व मौदत और रहमो करम टपकता हो। ये इसलिए कहा गया कि बूढ़े वाल्दैन को इस बुढ़ापे में सबसे ज़्यादा शीरीं कलामी की ज़रूरत है। जहां तक उनकी माद्दी ज़रूरियात का ताल्लुक़ है, वो अगर औलाद पूरा ना भी करे तो रब्बे कायनात उनकी रबूबियत उस वक़्त तक करता रहेगा जब तक उन्हें इस दुनिया में क़याम करना है।
    औलाद के करने का सबसे अहम काम ये है कि वो सब्र व तहम्मुल से काम ले, उन से तंग ना आए और उन के बुढ़ापे के अवारिज़ से परेशान ना हो जाए बल्कि उन से शीरीं कलामी के ज़रीए उनका दिल बहलाए, उनमें एतेमाद, उम्मीद जगाए और उनकी दिल बस्तगी का सामान करे। परवरदिगारे आलम ने अपने बंदों को ये उमूमी तालीम दी। इरशाद फ़रमायाः और लोगों के साथ भले तरीक़े से बात करो।
    रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इंसानी ज़िंदगी के किसी भी पहलू को ग़ैर अहम क़रार नहीं दिया। हज़रत अब्बू हुरैरा रज़िअल्लाहू अन्हू से मर्वी है कि एक सहाबी ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से दरयाफ़्त किया कि दुनिया में मुझ पर सबसे ज़्यादा हक़ किस का है यानी मेरे हुस्ने सुलूक का सबसे ज़्यादा मुस्तहिक़ कौन है तो आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया तुम्हारी माँ। सहाबी ने यही सवाल तीन मर्तबा दुहराया और तीनों मर्तबा आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने यही जवाब दिया कि तुम्हारे हुस्ने सुलूक की सबसे ज़्यादा मुस्तहिक़ तुम्हारी माँ है। चौथी मर्तबा आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि तुम्हारा बाप।
    एक और हदीस में आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि एक मुसलमान के दूसरे मुसलमान पर चंद हुक़ूक़ हैं। (1) जब मुसलमान भाई से मिले तो उसे सलाम करे (2) जब वो दावत दे तो उसे क़ुबूल करे (3) जब वो ख़ैर ख़्वाही चाहे तो उससे ख़ैर ख़्वाही की जाय (4) जब उसे छींक आए और वो अलहम्दोलिल्लाह कहे तो इसके जवाब में यरहमोकल्लाह कहे, और (5) जब वो इंतेक़ाल कर जाय तो इस के जनाज़े में शिरकत करे।
    हुस्ने खुल्क के बारे में आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का इरशादे गिरामी हैः सब से वज़नी चीज़ जो क़यामत के दिन मोमिन की मीज़ान में रखी जाएगी वो उसका हुस्ने एख़्लाक़ होगा। बेशक अल्लाह उस शख़्स को नापसंद फ़रमाता है जो ज़बान से बेहयाई की बात निकालता और बदज़बानी करता है। हज़रत अबदुल्लाह बिन मुबारक रज़ियल्लाहू अन्हू हुस्ने खुल्क की तशरीह यूं करते हैः और जब वो मिले तो हंसते हुए चेहरे से मिले और मोहताजों पर माल ख़र्च करे और किसी को तकलीफ़ ना दे।
    रहमतुललिल्आलमीन बंदों के बाहमी ताल्लुक़ात में बेहतरी और ख़ुशगवारी लाने के लिए अपने पैरोकारों को चंद ऐसी रुहानी बीमारियों से बचने की तलक़ीन फ़रमाते हैं जिनसे अगर एक इंसान बच जाय तो उसका वजूद बाइसे रहमत और उसकी हस्ती मूजिबे सुकून हो जाए। इरशाद नबवी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम है: अपने आप को बदगुमानी से बचाओ। दूसरों के बारे में मालूमात मत हासिल करते फ़िरो, एक दूसरे से बुग़्ज़ मत रखो और ना एक दूसरे की काट में लगे रहो।
    बंदों के हुक़ूक़ की अदायगी से इंसान की महरूमियाँ दूर हो जाती हैं और बाहमी मोहब्बत व यगांगत की फ़िज़ा पैदा हो जाती है। इस तरह बुग़् व अदावत का ख़ात्मा हो जाता है। ये बात ज़हन नशीन रहे कि हर आदमी सिर्फ अपने हुक़ूक़ की बात ना करे बल्कि फ़राइज़ को भी पहचाने। इस तरह हुक़ूक़ व फ़राइज़ के दरमियान एक मुनासिब तवाज़ुन बरक़रार रखे ताकि किसी का हक़ ग़सब ना हो और कोई फ़र्द महरूमियों का शिकार होकर इंतिहापसंदी की जानिब माएल ना हो।
    1 जून, 2012  बशुक्रियाः इन्क़िलाब,  नई दिल्ली
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    5 comments:

    Vinay Singh said...

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