बेटी को इज़्ज़त दो, इज़्ज़त की ज़िन्दगी जीने के लिए

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  • Monday, September 23, 2013
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  • HAKEEM YUNUS KHAN
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  • इस्लाम में औरत का मुकाम: एक झलक

    इस्लाम को लेकर यह गलतफहमी है और फैलाई जाती है कि इस्लाम में औरतको कमतर समझा जाता है। सच्चाई इसके उलट है। हम इस्लाम का अध्ययनकरें तो पता चलता है कि इस्लाम ने महिला को चौदह सौ  साल पहले वहमुकाम दिया है जो आज के कानून दां भी उसे नहीं दे पाए।
    इस्लाम में औरत के मुकाम की एक झलक देखिए।
    जीने का अधिकार शायद आपको हैरत हो कि इस्लाम ने साढ़े चौदह सौ सालपहले स्त्री को दुनिया में आने के साथ ही अधिकारों की शुरुआत कर दी और उसेजीने का अधिकार दिया। यकीन ना हो तो देखिए कुरआन की यह आयत-
    और जब जिन्दा गाड़ी गई लड़की से पूछा जाएगाबता तू किस अपराध केकारण मार दी गई?"(कुरआन81:8-9) )
    यही नहीं कुरआन ने उन माता-पिता को भी डांटा जो बेटी के पैदा होने परअप्रसन्नता व्यक्त करते हैं- 
    'और जब इनमें से किसी को बेटी की पैदाइश का समाचार सुनाया जाता है तो उसका चेहरा स्याह पड़ जाता है और वह दु:खी हो उठता है। इस 'बुरी'खबर के कारण वह लोगों से अपना मुँह छिपाता फिरता है। (सोचता हैवह इसे अपमान सहने के लिए जिन्दा रखे या फिर जीवित दफ्न कर देकैसेबुरे फैसले हैं जो ये लोग करते हैं।' (कुरआन16:58-59))
    बेटी
    इस्लाम के पैगम्बर मुहम्मद सल्लने फरमाया-बेटी होने पर जो कोई उसे जिंदा नहीं गाड़ेगा (यानी जीने का अधिकार देगा)उसे अपमानित नहीं करेगाऔर अपने बेटे को बेटी पर तरजीह नहीं देगा तो अल्लाह ऐसे शख्स को जन्नत में जगह देगा।इब्ने हंबल) अन्तिम ईशदूत हजऱत मुहम्मद सल्लनेकहा-'जो कोई दो बेटियों को प्रेम और न्याय के साथ पालेयहां तक कि वे बालिग हो जाएं तो वह व्यक्ति मेरे साथ स्वर्ग में इस प्रकार रहेगा (आप नेअपनी दो अंगुलियों को मिलाकर बताया)
    मुहम्मद सल्लने फरमाया-जिसके तीन बेटियां या तीन बहनें हों या दो बेटियां या दो बहनें हों और वह उनकी अच्छी परवरिश और देखभाल करे औरउनके मामले में अल्लाह से डरे तो उस शख्स के लिए जन्नत है। (तिरमिजी)
    पत्नी
    वर चुनने का अधिकार : इस्लाम ने स्त्री को यह अधिकार दिया है कि वह किसी के विवाह प्रस्ताव को स्वेच्छा से स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है।इस्लामी कानून के अनुसार किसी स्त्री का विवाह उसकी स्वीकृति के बिना या उसकी मर्जी के विरुद्ध नहीं किया जा सकता।
    बीवी के रूप में भी इस्लाम औरत को इज्जत और अच्छा ओहदा देता है। कोई पुरुष कितना अच्छा हैइसका मापदण्ड इस्लाम ने उसकी पत्नी को बनादिया है। इस्लाम कहता है अच्छा पुरुष वही है जो  अपनी पत्नी के लिए अच्छा है। यानी इंसान के अच्छे होने का मापदण्ड उसकी हमसफर है। 
    पैगम्बर मुहम्मद सल्लने फरमाया-
    तुम में से सर्वश्रेष्ठ इंसान वह है जो अपनी बीवी के  लिए सबसे अच्छा है। (तिरमिजीअहमद)
    शायद आपको ताज्जुब हो लेकिन सच्चाई है कि इस्लाम अपने बीवी बच्चों पर खर्च करने को भी पुण्य का काम मानता है।
    पैगम्बर मुहम्मद सल्लने फरमाया-
    तुम अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए जो भी खर्च करोगे उस पर तुम्हें सवाब (पुण्यमिलेगायहां तक कि उस पर भी जो तुम अपनी बीवी कोखिलाते पिलाते हो। (बुखारी,मुस्लिम)
    पैगम्बर मुहम्मद सल्लने कहा-आदमी अगर अपनी बीवी को कुएं से पानी पिला देता हैतो उसे उस पर बदला और सवाब (पुण्यदिया जाता है।(अहमद)
    मुहम्मद सल्लने फरमाया-महिलाओं के साथ भलाई करने की मेरी वसीयत का ध्यान रखो। (बुखारीमुस्लिम)
    माँ
    क़ुरआन में अल्लाह ने माता-पिता के साथ बेहतर व्यवहार करने का आदेश दिया है,
    'तुम्हारे स्वामी ने तुम्हें आदेश दिया है कि उसके सिवा किसी की पूजा  करो और अपने माता-पिता के साथ बेहतरीन व्यवहार करो। यदि उनमें से कोईएक या दोनों बुढ़ापे की उम्र में तुम्हारे पास रहें तो उनसे 'उफ् तक  कहो बल्कि उनसे करूणा के शब्द कहो। उनसे दया के साथ पेश आओ और कहो
    ' हमारे पालनहारउन पर दया करजैसे उन्होंने दया के साथ बचपन में मेरी परवरिश की थी।(क़ुरआन17:23-24))
    इस्लाम ने मां का स्थान पिता से भी ऊँचा करार दिया। ईशदूत हजरत मुहम्मद(सल्ल) ने कहा-'यदि तुम्हारे माता और पिता तुम्हें एक साथ पुकारें तोपहले मां की पुकार का जवाब दो।
    एक बार एक व्यक्ति ने हजरत मुहम्मद (सल्ल.) से पूछा'हे ईशदूतमुझ पर सबसे ज्यादा अधिकार किस का है?'
    उन्होंने जवाब दिया 'तुम्हारी माँ का', 
    'फिर किस का?' उत्तर मिला 'तुम्हारी माँ का',
    'फिर किस का?' फिर उत्तर मिला 'तुम्हारी माँ का
    तब उस व्यक्ति ने चौथी बार फिर पूछा 'फिर किस का?' 
    उत्तर मिला 'तुम्हारे पिता का।'
    संपत्ति में अधिकार-औरत को बेटी के रूप में पिता की जायदाद और बीवी के रूप में पति की जायदाद का हिस्सेदार बनाया गया। यानी उसे साढ़े चौदहसौ साल पहले ही संपत्ति में अधिकार दे दिया गया।
    http://www.erfan.ir/article/article.php?id=58888

    2 comments:

    Raj Mishra said...

    phir takiya ....kiya aap ne islam ka jhutha prachar karne k liye..aurte tumhari kheti hain jaise marzi waise jao ..(Quran)

    Huzur londiya rakhte ...(Bukhari)

    tumhare liye jayaz kar di hain tumhari bahuwe. jise iman walo ko koi shakti na rahe apni bahuwo se nikah karne me .quran(33:37)

    kitne % muslim aurte shikshit hain over all batao....10% kya yahi barabri hain ..

    9 sal ki ladki jab wo kuch janti nahi use nikah jayaz hain jita jagta pramad ..rasuleallah hain (ayesha) hain ......kya taqqiay karte ho muslim apni ladkiyo ko padhate nahi hain school nahi bhejte ...bhed bakri ki tarah muh band kar har jagah aati jati hain

    Raj Mishra said...

    -"आयशा ने कहा कि रसूल के पास रिफ़ा अल कुरैजी कि पत्नी आई और बोली , रीफा ने मुझे तलक दे दिया था . और मैंने अब्दुर रहमान बिन अबू जुबैर से शादी कर ली , लेकिन वह नपुंसक है , अब मैं वापिस रिफ़ाके पास जाना चाहती हूँ . रसूल ने कहा जब तक अब्दुर रहमान तुम्हारे साथ विधिवत सम्भोग नहीं कर लेता , तुम रिफ़ा के पास वापिस नहीं जा सकती .
    "إلا إذا كان لديك علاقة جنسية كاملة مع "
    Bukhari, Volume 7, Book 63, Number 186

    -"उम्मुल मोमिनीन आयशा ने कहा कि एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी से तीन बार तलाक कह दिया , और फिर से अपनी पत्नी से शारीरिक सम्बन्ध बनाने की इच्छा प्रकट की . रसूल ने कहा ऐसा करना बहुत बड़ा गुनाह है .. और जब तक उसकी पत्नी किसी दुसरे मर्द का शहद और वह उसके शहद का स्वाद नहीं चख लेते .
    "حتى انها ذاق العسل من الزوج الآخر وذاقه العسل لها "
    Abu Dawud, Book 12, Number 2302

    -"इमाम इब्न कदमा ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी से कहे कि मैंने तुझे तीनों तलाक दे दिए हैं . लेकिन चाहे उसने यह बात एक ही बार कही हो , फिर भी तलाक हो जायेगा .Al-Kafi 3/122
    "
    إذا قال لزوجته : أنت طالق ثلاثا فهي ثلاث وإن نوى واحدة“

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