सूर्यास्त

Posted on
  • Sunday, April 15, 2012
  • by
  • sadhana vaid
  • in



  • मैं धरा हूँ

    रात्रि के गहन तिमिर के बाद

    भोर की बेला में

    जब तुम्हारे उदित होने का समय आता है

    मैं बहुत आल्हादित उल्लसित हो

    तुम्हारे शुभागमन के लिए

    पलक पाँवड़े बिछा

    अपने रोम रोम में निबद्ध अंकुरों को

    कुसुमित पल्लवित कर

    तुम्हारा स्वागत करती हूँ !

    तुम्हारे बाल रूप को अपनी

    धानी चूनर में लपेट

    तुम्हारे उजले ओजस्वी मुख को

    अपनी हथेलियों में समेट

    बार बार चूमती हूँ और तुम्हें

    फलने फूलने का आशीर्वाद देती हूँ !

    लेकिन तुम मेरे प्यार और आशीर्वाद

    की अवहेलना कर

    अपने शौर्य और शक्ति के मद में चूर

    गर्वोन्नत हो

    मुझे ही जला कर भस्म करने में

    कोई कसर नहीं छोड़ते !

    दिन चढ़ने के साथ-साथ

    तुम्हारा यह रूप

    और प्रखर, और प्रचंड,

    रौद्र और विप्लवकारी होता जाता है !

    लेकिन एक समय के बाद

    जैसे हर मदांध आतातायी का

    अवसान होता है !

    संध्या के आगमन की दस्तक के साथ

    तुम्हारा भी यह

    रौरवकारी आक्रामक रूप

    अवसान की ओर उन्मुख होने लगता है

    और तुम थके हारे निस्तेज

    विवर्ण मुख

    पुन: मेरे आँचल में अपना आश्रय

    ढूँढने लगते हो !

    मैं धरा हूँ !

    संसार के न जाने कितने कल्मष को

    जन्म जन्मांतर से निर्विकार हो

    मैं अपने अंतर में

    समेटती आ रही हूँ !

    आज तुम्हारा भी क्षोभ

    और पश्चाताप से आरक्त मुख देख

    मैं स्वयं को रोक नहीं पा रही हूँ !

    आ जाओ मेरी गोद में

    मैंने तुम्हें क्षमा किया

    क्योंकि मैं धरा हूँ !

    साधना वैद

    5 comments:

    dheerendra said...

    तुम्हारा यह रूप
    और प्रखर, और प्रचंड,
    रौद्र और विप्लवकारी होता जाता है !
    लेकिन एक समय के बाद
    जैसे हर मदांध आतातायी का
    अवसान होता है,

    बहुत सुंदर भाव की रचना...साधना जी
    .
    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: आँसुओं की कीमत,....

    शिखा कौशिक said...

    bahut sundar sadhna ji .aabhar

    DR. ANWER JAMAL said...

    बहुत गहरी बात बड़ी ख़ूबसूरती से कही है आपने।

    Dr.NISHA MAHARANA said...

    और पश्चाताप से आरक्त मुख देख
    मैं स्वयं को रोक नहीं पा रही हूँ !
    आ जाओ मेरी गोद में


    मैंने तुम्हें क्षमा किया
    क्योंकि मैं धरा हूँ
    ....sahi bat .....bahut acchi abhwayakti....

    Anjana (Gudia) said...

    bahut hi sunder! saadar

    There was an error in this gadget

    Followers

    प्यारी माँ

    Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
    • विश्वास - ‘विश्वास’ कितना आभासी है ना यह शब्द ! कितना क्षणिक, कितना छलनामय, कितना भ्रामक ! विश्वास के जिस धागे से बाँध कर कल्पना की पतंग को आसमान की ऊँच...
    • राजीव गांधी :अब केवल यादों में - शत शत नमन - एक नमन राजीव जी को आज उनकी जयंती के अवसर पर.राजीव जी बचपन से हमारे प्रिय नेता रहे आज भी याद है कि इंदिरा जी के निधन के समय हम सभी कैसे चाह रहे थे कि ...
    • हमें अपनी झील के आकर्षण में बंधे रहना है - #हिन्दी_ब्लागिंग मैं कहीं अटक गयी हूँ, मुझे जीवन का छोर दिखायी नहीं दे रहा है। मैं उस पेड़ को निहार रही हूँ जहाँ पक्षी आ रहे हैं, बसेरा बना रहे हैं। कहाँ ...
    • शापित मंजिलें - *... स्थितियाँ * *बदल देती हैं * *राह जिंदगी की ...* *... मंजिलें* *अक्सर अकेली रह * *शापित हो जाया करती हैं !!* *सु-मन *
    • बातें हैं बातों का क्या ....... - अम्बुआ की डाली पर चाहे न कुहुके कोयल किसी अलसाई शाम से चाहे न हो गुफ्तगू कोई बेनामी ख़त चाहे किसी चौराहे पर क्यों न पढ़ लिया जाए ज़िन्दगी का कोई नया शब्दक...
    • केवल राष्ट्र के लिए था यह सृजन - देश की स्वतंत्रता के लिए 1857 से लेकर 1947 तक क्रान्तिकारियों व आंदोलनकारियों के साथ ही लेखकों, कवियों और पत्रकारों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय...
    • कृष्ण लीला - ग्वाल बाल साथ ले कान्हा ने धूम मचाई गोकुल की गलियों में ! खिड़की खुली थी घर में छलांग लगाई खाया नवनीत खिलाया मित्रों को भी कुछ खाया कुछ फैलाया आहट ...
    • नींद बनाम ख्व़ाब - मैंने अपनी नींदें बेच, कुछ ख्वाब खरीदे थे। रख दिया था सहेज कर, उन्हें अपनी पलकों तले। वक़्त की बारिशों औ आंधी से, कुछ उड़ गए, कुछ बह गए। कुछ को बचाया जतन...
    • - गज़ल 1 मुहब्बत से रिश्ता बनाया गया उसे टूटते रोज पाया गया मुहब्बत पे उसकी उठी अँगुलियाँ सरे बज़्म रुसवा कराया गया यहाँ झूठ बिकता बड़े भाव पर मगर सच को ठेंगा द...
    • माँ तुझे प्रणाम - *माँ तुझे प्रणाम* *शत शत नमन कोटि प्रणाम * *माँ तुझे प्रणाम ।* *जब मैं तेरी कोख में आई * *तूने स्पर्श से बताया था * *ममता का कोई मोल नहीं * *तूने ही सि...
    • जाने कहाँ गया वो दिन??? - "आज कुछ special बना दो, Sunday है... " ... अभी तो परसों कढ़ाही पनीर बनी थी... "सुनो, मैं अपने दोस्तों से मिल कर आ रहा हूँ, वो आज Sunday है न..." ... हाँ, द...
    • अधूरे हम... - एक युवक बगीचे में खिन्न मुद्रा में बैठा था । एक बुजुर्ग ने उस परेशान युवक से पूछा - क्या हुआ बेटा क्यूं इतने परेशान हो ? युव...
    • नया साल ! - समर घर से निकला तो पत्नी और बच्चों के लिए गिफ्ट पहले ही खरीदता हुआ होटल पहुंचा था। रात में प्रोग्राम ख़त्म करके सीधे घर भागेगा क्यो...
    • वेदों में गायन कला - *- डॉ. शरद सिंह* *गायन मानव की संवेदनाओं को जागृत करता है.आज दुनिया भर में संगीत के महत्व पर वैज्ञानिक शोध हो रहे हैं . पाश्चात्य जगत के व...
    • भ्रष्ट आचार - स्वतंत्र भारत की नीव में उस समय के नेताओं ने अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के रख दिये थे भ्रष्ट आचार फिर देश से कैसे खत्म हो भ्रष्टाचार ?
    • उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (भाग -9) - *(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से जग कर वे,अपना पुराना जीवन याद करने लगती > हैं.उनकी चार बेटियों और दो बेटों से घर गुलज़ार रहता. पति गाँव के स्कूल में > ...

    मन की दुनिया

    नारी का पूर्ण सशक्तिकरण

     
    Copyright (c) 2010 प्यारी माँ. All rights reserved.