नारी को आगे बढ़ने में मदद करते हैं पुरूष भी

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  • Monday, September 26, 2011
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  • DR. ANWER JAMAL
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  • जो सच में एक नारी होती है वह कहती है कि उसे आगे बढ ने में उसकी मां ने ही नहीं बल्कि उसके बाप ने भी मदद की है। इक्का दुक्का नासमझ औरत-मर्दों ने कभी कभी इस सच्चाई को झुठलाने की कोशिशें भी की हैं लेकिन सच बहरहाल सच होता है और वह बार बार सामने आता रहता है।
    यह स्टोरी पढ़ी तो यही सच एक बार फिर हम सबके सामने आ गया है।
    पेरेंट्स का भरोसा बनाता है बेटियों को कामयाब
    संदीप द्विवेदी गुड़गांव।

    बेटियों की कामयाबी की असल वजह पेरेंट्स का भरोसा होता है। आत्मविश्वास से भरी कनुप्रिया कहती हैं कि पेरेंट्स अगर लड़कियों को प्रोत्साहित करें और उन्हें अपने फैसले लेना सिखाएं तो किसी भी समाज की तकदीर बदल सकती है। कनुप्रिया डिडवानिया (अग्रवाल) देश की पहली टेस्ट टय़ूब बेबी हैं। कलकत्ता में जन्मीं कनुप्रिया ने पुणे से मैनेजमेंट की पढ़ाई की और पिछले दस सालों से साइबर सिटी में रह रही हैं। वो एक नामी कन्फेकशनरी कंपनी में ग्रुप प्रोडक्ट मैनेजर के तौर पर काम कर रही हैं।
    बदलते सामाजिक परिदृश्य में बदलती सोच को सही करार देते हुए कनुप्रिया कहती हैं कि अब लड़कियां शादी के बाद पराई नहीं होती। लड़कों की तुलना में लड़कियों का जीवन भी चुनौतीपूर्ण होता है। कनुप्रिया कहती हैं कि नौकरी और ससुराल के बीच सामंजस्य बिठाना लड़कियों के बस की ही बात है। कनुप्रिया कहती हैं कि हरियाणा जैसी जगहों में सेक्स रेशियो के कम होने की वजहों को टटोलना बेहद जरुरी है। आखिर सामाजिक ढांचे में ऐसी क्या कसर है जो बेटियों को बोझ समझा जाता है हालांकि शहरों में और कुछ हद तक गांवों में हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। आज से तैंतीस साल पहले जब मेडिकल जगत में संसाधन बेहद कम थे और सामाजिक सोच भी संकीर्ण थी। मेरा जन्म होना एक बड़ी बात थी।कनुप्रिया कहती हैं कि उन्हें कभी लड़की होने की वजह से बंदिशों में नहीं रखा गया। अच्छी पढ़ाई और परवरिश ने ही उनका आत्मविश्वास बढ़ाया है। घर में अब तक पेरेंट्स से एक ही बार डांट पड़ी है जब उन्होंने बचपने में कहा था कि शायद आप लोगों को भी लड़की होने पर दुख हुआ होगा। देश के नामी मैनेजमेंट कॉलेजों में प्रबंधन के गुर सिखाने वाली कनुप्रिया अपनी कामयाबी का श्रेय अपने अभिभावकों और डॉक्टरों को देती हैं। एक पारंपरिक मारवाड़ी परिवार में जन्मीं कनुप्रिया पिता प्रभात अग्रवाल और मां बेला अग्रवाल के साथ ही डॉक्टरों की उस टीम के भी बेहद करीब हैं जो आईवीएफ तकनीक के लिए एडवांस रिसर्च से जुड़ा रहा है।  स्वर्गीय डॉक्टर सुभाष मुखोपाध्याय का बेहद सम्मान करने वाली कनुप्रिया कहती हैं कि पेरेंट्स के साथ ही उनके साहस और विश्वास की वजह से ही मेरा अस्तित्व है। डॉक्टर सुनीत मुखर्जी और आनंद कुमार को भी परिवार का हिस्सा बताती हैं।

    पूरी तरह सामान्य जीवन जी रही कनुप्रिया कहती हैं कि टेस्ट टय़ूब बेबी भी आम बच्चों की तरह ही होते हैं। तीन अक्टूबर 1978 को जन्मीं कनुप्रिया अब 33 साल की हो चुकी हैं। कनुप्रिया की शादी को भी अब पांच साल हो गए हैं। कनुप्रिया को घर में सब दुर्गा बुलाते हैं। उनका कहना है कि दुर्गा महज देवी नही हैं। बुराई या गलत के खिलाफ आवाज उठाने की प्रवृत्ति भी है जो सभी लड़कियों में छुपी होती है।

    Source 
    http://www.livehindustan.com/news/desh/deshlocalnews/article1-story-39-0-192473.html&locatiopnvalue=1

    8 comments:

    वन्दना said...

    आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

    वन्दना said...

    सार्थक सोच ही सार्थक अन्जाम तक पहुँचती है।

    Unlucky said...

    बेहद ही सुन्दर ब्लॉग, उतनी ही सुन्दर सामग्री यहाँ पोस्ट की गयी है मई बहोत दिनों से ऐसे ही किसी ब्लॉग की तलास में था आज मिल ही गया,

    मेरे ब्लॉग के लिए क्लिक करे Japan Tsunami

    KANTI PRASAD said...

    बहुत ही सुन्दर भाव भर दिए हैं पोस्ट में........शानदार| नवरात्रि पर्व की शुभकामनाएं

    amrendra "amar" said...

    बेहतरीन अभिव्यक्ति....
    आपको सपरिवार नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं

    Babli said...

    आपका सभी ब्लॉग एक से बढ़कर एक है!
    बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण पोस्ट! दिल को छू गई!

    कविता रावत said...

    खूबसूरत और भावमयी अभिव्यक्ति....
    आपको सपरिवार नवरात्रि पर्व की शुभकामनाएं

    NISHA MAHARANA said...

    उनका कहना है कि दुर्गा महज देवी नही हैं। बुराई या गलत के खिलाफ आवाज उठाने की प्रवृत्ति भी है जो सभी लड़कियों में छुपी होती है।
    bilkul shi.

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