अहमियत पिता की

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  • Saturday, July 2, 2011
  • by
  • Pallavi saxena
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  • आपको याद होगा कि अभी कुछ दिन पहले मैंने माँ के ऊपर एक लेख लिखा था और आज मैं ना सिर्फ माँ की बात कर रही हूँ, बल्कि पिता की अहमियत की। अकसर जब भी हम माँ विषय पर कोई लेख पढ़ते हैं तो हमारा मन  माँ के प्रति गद-गद हो जाता है और हम नतमस्तक सा महसूस करने लगते है। मगर उस वक्त हमको पिता का ख़्याल भी नहीं आता कि जिस तरह हम माँ के बिना अधूरे हैं, ठीक उसी तरह पिता के बिना भी हमारा जीवन उतना ही अधूरा है। माँ की ममता तो सब को दिखती है। मगर पापा का प्यार किसी को नहीं दिखता, हालांकि यह सच है और इस में कोई दो राय नहीं है कि माँ  का दर्जा और उसकी अहमियत हमारे जीवन में जो मायने रखती है वह दूसरा और कोई रिश्ता नहीं जो इस रिश्ते की जगह ले सके यहाँ तक कि खुद माँ के बदले आने वाली सौतेली माँ तक खुद कभी माँ की जगह नहीं ले पाती, हालांकि सौतेली माँ का नाम तो ऐसा बदनाम है, कि लोग उस विषय में सोचने से भी घबराते हैं। फिर भले ही सौतेली माँ बुरी हो या ना हो, मगर इस मामले ठीक ऐसा है कि एक बार यह रिश्ता बदनाम हुआ तो हमेशा लोग इस रिश्ते को उसी नजर से देखते हैं, भले ही वो रिश्ता इतना बुरा हो या न हो। 
     खैर मैं बात कर रही थी माता और पिता की अहमियत कि तो एक बच्चे के लिए जितना जरूरी उसकी माँ का होना है। उतना ही जरूरी पिता का रिश्ता भी है। एक बच्चे का जीवन पिता के प्यार के बिना भी उतना ही अधूरा है जितना की माँ के प्यार के बिना आज कई सारी ऐसी माएं हैं। जो बिना पिता के भी अपने बच्चों को बहुत ही अच्छे ढंग से पाल पोस रही हैं। मगर तब भी कहीं न कहीं बच्चे के कोमल मन में पिता के ना होने की कमी खलती ही है ,जिस रह एक माँ के न होने से बच्चे को माँ की लोरीयाँ खलती है। ठीक उस ही तरह पिता के न होने पर भी उनके साथ घूमना फिरना मौज मस्ती उठा पटक वाले खेल यह सब भी बच्चों को बहुत खलता है।
     आप ने भी देखा होगा और मेरे अपने भी बहुत से अनुभव है इस विषय पर, मैं मेरे पापा के बहुत करीब हूँ. अपनी मम्मी से भी ज्यादा और मुझे आज भी याद है जब भी कोई बात मनवाना होती थी और मम्मी माना कर दिया करती थी तो पापा झट से इजाजत दे दिया करते थे। कई बार तो रिपोर्ट कार्ड पर कम नंबर आने पर भी पापा ही हस्ताक्षर कर दिया करते थे। ताकी मम्मी की डांट न पड़े मुझे पर मम्मी तक तो बहुत सी बातें पहुँचती ही नहीं थी ,और ठीक यही गुण मेरे बेटे में भी आया है वो भी मुझ से भी ज्यादा अपने पापा के बहुत करीब है।  उसके और उसके दोस्तों में तो अकसर बातें भी ऐसी ही होती है की किस के पापा बेस्ट हैं। सभी बच्चे अपने-अपने पापा को बेस्ट बताने के लिए मासूमियत भरे तर्क दिया करते है। J उस बात से एहसास होता है कि छोटे बच्चे के जीवन में पिता का भी कितना महत्व होता है। जिस तरह माँ के हाथ का खाना हमेशा याद आता है, ठीक उसी तरह पापा के साथ की गई मस्ती भी बहुत याद आती है। अगर एक माँ बच्चे की पहली पाठशाला होती है तो एक पिता उसकी बाहरी दुनिया की पाठशाला होते हैं। बाहर की दुनिया में सर उठा के ज़ीने के लिए सही मार्ग पापा ही तो सीखते है। गिर कर सँभालना भी तो पापा ही सिखाते हैं, और बेटी के मामलों में प्यार भी तो सब से ज्यादा पापा ही करते है। J है ना!!! J
    जिस तरह एक लड़की के लिए उस की माँ ही उसकी सबसे अच्छी और खास दोस्त होती है। तो एक बेटे के लिए उसके सब से अच्छे दोस्त उसके पापा ही होते है। अगर एक पिता के लिए उसका बेटा उसके बुढ़ापे की लाठी  होता है, उनका सहारा होता है और यदि उनका गौरव होता है, तो एक बेटी भी अपने पापा की इज्ज़त होती है, उसका मान सम्मान होती है। अपने पापा को लेकर मेरे पास अपने  बचपन की बहुत सारी यादें हैं, जिनको मैं आप सब के साथ बांटना चाहती हूँ। जैसे जब मैं रोटी बनाना सीख रही थी न, तब अकसर मुझ से रोटी जल जाया करती थी या कभी उसका आकार सही नहीं आ पाता था। तब मेरे पापा चुपके से वही रोटी खाने के लिए ले लिया करते थे। ताकि मुझे मम्मी से डांट ना पड़े और हमेशा ही कच्चा पक्का कभी नमक कम, तो कभी ज्यादा, कैसा भी बना हुआ मेरे हाथ का खाना खुशी–खुशी खाया लिया करते  थे। उन्होने कभी शिकायत नहीं कि  बल्कि हमेशा यह ही कहा कि कोई बात नहीं अभी तो तुम छोटी हो और सीख रही हो मुझे पूरा यकीन है एक दिन तुम्हें मम्मी से भी अच्छा खाना बनाना जाएगा। अगर कभी घर आने में देर हो जाया करती थी और मम्मी नाराज हो जाया करती थी तो घर में पैर रखते ही पापा इशारे से बता दिया करते थे कि घर का माहौल गरम है चुप रहने में ही भलाई है। J
    My son with his father

    इसलिए मैं तो आज भी कहती हूँ कि MY PAPA IS THE BEST PAPA OF THE WORLDस्कूल  में या कभी कालेज़ में जब भी कभी कोई मदद की जरूरत पड़ती थी जब भी कभी कोई बात ऐसी होती थी। जिसमें यह लगता कि मम्मी मना कर देंगी तो मैं अकसर वो बात आपने पापा से बांटा करती थी। फिर चाहे वो भी मना कर दें मुझे तो चलता था, मगर मैं अपनी हर बात कहा उनसे ही करती थी और कभी राखी पर जब मेरे हाथ मेहँदी से भरे होते थे ना तो उस रात भी पापा ही अपने हाथ से खाना खिलाया करते थे और जब भी कभी भईया से झगड़ा हुआ करता था तभी पापा मेरा ही पक्ष लिया करते थे। अगर मैं रूठ जाती थी तो घंटों मुझे मनाया भी करते थे।
    यह मेरे अनुभव हैं, आप की भी बहुत सी  खट्टी मीठी यादें और अनुभव जुड़े होंगे न अपने पापा से। J
    यदि एक छोटे बच्चेनुमा पौधे को माँ अपने खून से सींचती है, तो एक खुले आसमान की तरह उसकी हिफाजत करते हैं। पिता यदि माँ जीवन का आधार है तो उस जीवन को देने वाले पिता उसकी नींव हुआ करते हैं। 

    5 comments:

    रविकर said...

    बहुत अच्छी प्रस्तुति |

    माँ तो भगवान् है पर

    पिता एक मूक-मदद है

    बच्चों के विकास में ||

    आज पीढ़ियों में सोच का

    अन्तर निश्चय ही कम हो रहा है |

    पिता बच्चों के अच्छे दोस्त साबित हो रहे हैं||


    इसी बात पर मेरे बेटे K ब्लॉग पर टहल कर आयें ||


    http://kushkikritiyan.blogspot.com/

    DR. ANWER JAMAL said...

    जन-जागरण हेतु काम की जानकारी !
    मुबारकबाद !!!
    त्वचा में दर्द के अभिग्राहकः Receptors

    Vivek Jain said...

    बहुत सुंदर आलेख, बच्चे के लिये माँ और पिता दोनों की बराबर अहमियत है,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

    Vivek Jain said...

    बहुत सुंदर आलेख, बच्चे के लिये माँ और पिता दोनों की बराबर अहमियत है,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

    Bhushan said...

    बढ़िया विवरण. हमारे माता-पिता हमारे असली हीरो-हीरोइन होते हैं.

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