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  • Saturday, June 25, 2011
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  • Prerna Argal
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  • पीढ़ियों  का अंतराल 

    आजकल युवा पीढ़ी परयह इल्जाम लगाए जाते हैं की आजकल के युवा बुजुर्गों का आदर नहीं करते उनकी देखभाल नहीं करते उनको समय नहीं देते /
    यह एक सोचने वाली बात है /पुरानी पीढ़ी और एक नई पीढ़ी का अंतराल तो है /परन्तु क्या पुरानी पीढ़ी नए जमाने के साथ अपनी सोच ,अपनी आदतें अपना सहयोग कायम रखतीं हैं/हमारे जमाने का गुणगान करने की जगह नए जमाने में हो रहे बदलाव ,को अपनाएँ अपने बच्चों को आजकल के प्रतियोगी ,भाग-दौड़           वाली जिंदगी में कदम से कदम मिला कर चलने में  सहयोग करें/जो काम वो घर में रहकर आराम से कर सकतें हैं उसको करने में संकोच ना करें और ना ही अपना अहम् बीच में लायें /तो उनका समय भी अच्छे से बीतेगा और उनका मान अपने आप बढेगा /आजकल जिस तरह महंगाई दिन पर दिन बढ़ रही है उसमें एक ब्यक्ति की तनख्वा से ग्रहस्थी  चलाना नामुमकिन है तो पति-पत्नी  दोनों को ही बाहर काम करके अपनी ग्रहस्थी  चलाने की जिम्मेदारी उठानी पढती है /पहले नारी को केवल घर के कार्य ही करने होते थे /बाहर के कार्यों से उनको कोई मतलब नहीं होता था /ज्यादा पढ़ी-लिखी भी नहीं होतीं थीं और कुछ उस जमाने का माहौल भी ऐसा था की बैंक के काम बच्चों के स्कूल की फीस वग्हेरा का काम पुरुष ही करते थे /परन्तु आजकल नारी दोहरा  कार्य कर रही है/ग्रहस्थी   के कार्य तो कर ही रही है ,पैसे भी कमा रही है और बैंक,स्कूल बाहर के कार्यों की भी जिम्मेदारी  उठा रही है /उसके बाद घर में उससे यह अपेक्षा  रखना तुम्हारे ज़माने  जैसे ही घर के काम करे तुम्हारी पूरी सेवा करे /तुम जैसे चाहो वैसा ही पहने ओढ़े तो क्या यह संभव है /जो बुजुर्ग इन सब बातों को समझतें हैं /अपने विचारों में परिवर्तन ले आतें है समयानुसार नई पीढ़ी के साथ उनकी समस्या को अपने अनुभव के ज्ञान से सुलझाने में मदद करतें हैं / घर के छोटे -छोटे कामों में हाथ बंटाते हैं बेकार की नुक्ताचीनी नहीं करते /बच्चों की मजबूरी और परेशानियों को समझते हैं वो बुजुर्ग घर में पूरा सम्मान पातें हैं ,और कदम-कदम पर घर के प्रत्येक सदस्य की जरुरत बन जातें हैं /आजकल एकल परिवार वाले युग में और ऐसे माहौल में जहाँ इंसान का इंसान पर भी विश्वास करना मुश्किल हो रहा है /बुजुर्गों का साथ में रहने से बच्चों की सुरक्षा ,घर की सुरक्षा की चिन्ता से मुक्त होकर आराम से पति-पत्नी अपने कार्यों पर जा सकते हैं /आज की पीढ़ी को भी ऐसे बुजुर्गों की पूरी इज्जत करना .उनकी स्वास्थ सम्बन्धी देखभालकरना .उनकी जरूरतों का पूरा ध्यान रखना चाहिए /
    अथार्त अगर नए जमाने के साथ ,उसके बदलाव को स्वीकार करते हुए नई पीढ़ी की मजबूरियों को समझते हुए सहयोग करे और नयी पीढ़ी भी पुरानी पीढ़ी को मान सम्मान के साथ उनके अनुभव का लाभ उठाते हुए उनके स्वास्थ का ध्यान रखते हुए अपने कर्तव्यों का ध्यान रखे.तो ये पीदियों में होने वाले विचारों का अंतराल ख़त्म हो जाए /और दोनों पीदियाँ एक दूसरे के बिना रहनें की सोचें भी ना./दोनों एक दूसरे के पूरक हैं और साथ में रहने से सुरक्षित भी./
    साथ में रहने का सुख उठाओ ,एक दूसरे को दिल से अपनाओ 
    छोटी-छोटी बातों और अहम्  को भूलकर ,हंसी-खुशी जिंदगी बिताओ  

    6 comments:

    रविकर said...

    रिश्तों की पूंजी जमा, मनुआ धीरे खर्च |
    एक-एक को ध्यान से, ख़ुशी-ख़ुशी संवर्त ||

    कविता रावत said...

    साथ में रहने का सुख उठाओ ,एक दूसरे को दिल से अपनाओ
    छोटी-छोटी बातों और अहम् को भूलकर ,हंसी-खुशी जिंदगी बिताओ
    ....bilkul sachi baat..... yahi sab to sab samjh jaayen to phir rona kis baat ka....
    bahut hi badiya prastuti...aabhar

    DR. ANWER JAMAL said...

    आपकी पोस्ट अच्छी है और बहुत से पहलुओं पर रौशनी डालती है ।
    औरत आज घर के काम तो करती ही है लेकिन उसे पैसे कमाने के लिए बाहर की दुनिया में काम भी करना पड़ता है । बहुत से बच्चे माँ के बाहर रहने के कारण असुरक्षित होते हैं और अप्रिय हादसों के शिकार बन जाते हैं ।
    आज के हालात गवाह हैं कि जिस सभ्यता में भी औरत को उसके बच्चों से दूर कर दिया गया । उस सभ्यता के नागरिकों का चरित्र कमज़ोर हो गया और जिस सभ्यता के नागरिकों में अच्छे गुणों का अभाव हो जाता है वह बर्बाद हो जाती है ।
    औरत का शोषण बंद होना चाहिए ताकि हमारी नस्लें अपनी माँ की मुनासिब देखभाल पा सकें ।

    आशा said...

    कई पहलू उजागर करती पोस्ट |
    अच्छी लगी |बधाई
    आशा

    रविकर said...

    रिश्तों की पूंजी बड़ी , हर-पल संयम *वर्त | *व्यवहार कर

    पूर्ण-वृत्त पेटक रहे , असली सुख संवर्त ||

    दिगम्बर नासवा said...

    सच कहा है ... साथ साथ रहना एक दुसरे को आदर देना ... यही हमारी संस्कृति है यही हमें करना चाहिए ...

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