बेसन की सोंधी रोटी

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  • Monday, June 13, 2011
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  • shikha kaushik
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  • बेसन की सोंधी रोटी

    बेसन की सोंधी रोटी पर
    खट्टी चटनी जैसी माँ
    याद आती है चौका बासन
    चिमटा फुँकनी जैसी माँ

    बान की खूर्रीं खाट के ऊपर
    हर आहट पर कान धरे
    आधी सोई आधी जागी
    थकी दुपहरी जैसी माँ

    चिड़ियों की चहकार में गूँजे
    राधा-मोहन अली-अली
    मुर्गे की आवाज़ से खुलती
    घर की कुंडी जैसी माँ

    बीवी बेटी बहन पड़ोसन
    थोड़ी थोड़ी सी सब में
    दिनभर एक रस्सी के ऊपर
    चलती नटनी जैसी माँ

    बाँट के अपना चेहरा माथा
    आँखें जाने कहाँ गईं
    फटे पुराने इक अलबम में
    चंचल लड़की जैसी माँ
    - निदा फ़ाज़ली

    [विवेक  जी ने अपने ब्लॉग पर यह पोस्ट प्रस्तुत की है .उनके ब्लॉग का url -''http://vivj2000.blogspot.कॉम'' है .]
                                                                               शिखा कौशिक 

    11 comments:

    Vivek Jain said...

    शिखा जी, आपका बहुत बहुत धन्यवाद
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

    शालिनी कौशिक said...

    BAHUT SUNDAR prastuti.

    Sunil Kumar said...

    खुबसूरत ग़ज़ल .....

    निर्मला कपिला said...

    बाँट के अपना चेहरा माथा
    आँखें जाने कहाँ गईं
    फटे पुराने इक अलबम में
    चंचल लड़की जैसी माँ
    वाह कमाल की रचना है। धन्यवाद।

    वन्दना said...

    बहुत सुन्दर रचना।

    रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

    लीगल सैल से मिले वकील की मैंने अपनी शिकायत उच्चस्तर के अधिकारीयों के पास भेज तो दी हैं. अब बस देखना हैं कि-वो खुद कितने बड़े ईमानदार है और अब मेरी शिकायत उनकी ईमानदारी पर ही एक प्रश्नचिन्ह है

    मैंने दिल्ली पुलिस के कमिश्नर श्री बी.के. गुप्ता जी को एक पत्र कल ही लिखकर भेजा है कि-दोषी को सजा हो और निर्दोष शोषित न हो. दिल्ली पुलिस विभाग में फैली अव्यवस्था मैं सुधार करें

    कदम-कदम पर भ्रष्टाचार ने अब मेरी जीने की इच्छा खत्म कर दी है.. माननीय राष्ट्रपति जी मुझे इच्छा मृत्यु प्रदान करके कृतार्थ करें मैंने जो भी कदम उठाया है. वो सब मज़बूरी मैं लिया गया निर्णय है. हो सकता कुछ लोगों को यह पसंद न आये लेकिन जिस पर बीत रही होती हैं उसको ही पता होता है कि किस पीड़ा से गुजर रहा है.

    मेरी पत्नी और सुसराल वालों ने महिलाओं के हितों के लिए बनाये कानूनों का दुरपयोग करते हुए मेरे ऊपर फर्जी केस दर्ज करवा दिए..मैंने पत्नी की जो मानसिक यातनाएं भुगती हैं थोड़ी बहुत पूंजी अपने कार्यों के माध्यम जमा की थी.सभी कार्य बंद होने के, बिमारियों की दवाइयों में और केसों की भागदौड़ में खर्च होने के कारण आज स्थिति यह है कि-पत्रकार हूँ इसलिए भीख भी नहीं मांग सकता हूँ और अपना ज़मीर व ईमान बेच नहीं सकता हूँ.

    shanno said...

    हमारे सबके लिये इतनी प्यारी रचना प्रस्तुत करने का बहुत शुक्रिया, शिखा जी.

    shanno said...

    आधी सोई आधी जागी
    थकी दुपहरी जैसी माँ

    बहुत खूब...:)

    DR. ANWER JAMAL said...

    सुन्दर रचना.

    Anjana (Gudia) said...

    बीवी बेटी बहन पड़ोसन
    थोड़ी थोड़ी सी सब में
    दिनभर एक रस्सी के ऊपर
    चलती नटनी जैसी माँ

    बाँट के अपना चेहरा माथा
    आँखें जाने कहाँ गईं
    फटे पुराने इक अलबम में
    चंचल लड़की जैसी माँ

    pyari rachna :-)

    रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

    मेरा बिना पानी पिए आज का उपवास है आप भी जाने क्यों मैंने यह व्रत किया है.

    दिल्ली पुलिस का कोई खाकी वर्दी वाला मेरे मृतक शरीर को न छूने की कोशिश भी न करें. मैं नहीं मानता कि-तुम मेरे मृतक शरीर को छूने के भी लायक हो.आप भी उपरोक्त पत्र पढ़कर जाने की क्यों नहीं हैं पुलिस के अधिकारी मेरे मृतक शरीर को छूने के लायक?

    मैं आपसे पत्र के माध्यम से वादा करता हूँ की अगर न्याय प्रक्रिया मेरा साथ देती है तब कम से कम 551लाख रूपये का राजस्व का सरकार को फायदा करवा सकता हूँ. मुझे किसी प्रकार का कोई ईनाम भी नहीं चाहिए.ऐसा ही एक पत्र दिल्ली के उच्च न्यायालय में लिखकर भेजा है. ज्यादा पढ़ने के लिए किल्क करके पढ़ें. मैं खाली हाथ आया और खाली हाथ लौट जाऊँगा.

    मैंने अपनी पत्नी व उसके परिजनों के साथ ही दिल्ली पुलिस और न्याय व्यवस्था के अत्याचारों के विरोध में 20 मई 2011 से अन्न का त्याग किया हुआ है और 20 जून 2011 से केवल जल पीकर 28 जुलाई तक जैन धर्म की तपस्या करूँगा.जिसके कारण मोबाईल और लैंडलाइन फोन भी बंद रहेंगे. 23 जून से मौन व्रत भी शुरू होगा. आप दुआ करें कि-मेरी तपस्या पूरी हो

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