माँ,मेरी माँ,

Posted on
  • Sunday, May 1, 2011
  • by
  • Shalini Kaushik
  • in
  • Labels:

  • माँ,मेरी माँ,
       खुद को क्यों न देखती हो?
    बच्चे कुछ बन जाये मेरे,
       हरदम ये ही  सोचती हो.

    बच्चे खेलें तो तुम खुश हो,
        पढ़ते देखके व्यस्त काम में,
    बच्चे सोते तब भी जगकर,
        खोयी हो बस इस ख्याल में,
    चैन से बच्चे सोये मेरे इसीलिए तुम जगती हो!
    बच्चे कुछ बन जाये मेरे हरदम ये ही सोचती हो.

    बच्चे जो फरमाइश करते,
                  आगे बढ़ पूरी करती.
    अपने खाने से पहले तुम ,
                बच्चों का हो पेट भरती .
    बच्चे पर कोई आंच जो आये,आगे बढ़कर झेलती हो!
    बच्चे कुछ बन जाएँ मेरे हरदम ये ही सोचती हो.

    बच्चे केवल खुद की सोचें,
            तुम बस उनको देखती हो.
    तुम्हारे लिए कुछ करें न करें,
           तुम उनका सब करती हो.
    अच्छे  जीवन के सपने तुम,बच्चों के लिए बुनती हो!
    बच्चे कुछ बन जाये मेरे,हरदम ये ही सोचती हो.
                             शालिनी कौशिक 

    3 comments:

    शिखा कौशिक said...

    bahut sundar bhavpoorn rachna.badhai

    DR. ANWER JAMAL said...

    Nice post.
    Dil ko chhoo gayee.

    Surendrashukla" Bhramar" said...

    अपने खाने से पहले तुम ,
    बच्चों का हो पेट भरती .
    शालिनी जी यही तो है माँ जो बलिदान के कारनामो से भरी पड़ी है उसके प्यार और ममता के बारे में जितना भी लिखा जाये बहुत कम है
    सुन्दर रचना
    शुक्ल भ्रमर ५

    There was an error in this gadget

    Followers

    प्यारी माँ

    Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
    • तुम गाँधी तो नहीं ! - ना ना पीछे मुड़ कर ना देखना क्या पाओगे वहाँ वीभत्स सचाई के सिवा जिसे झेलना तुम्हारे बस की बात नहीं तुम कोई गाँधी तो नहीं ! सामने देखो तुम्हें आगे बढ़ना ...
    • शापित मंजिलें - *... स्थितियाँ * *बदल देती हैं * *राह जिंदगी की ...* *... मंजिलें* *अक्सर अकेली रह * *शापित हो जाया करती हैं !!* *सु-मन *
    • बातें हैं बातों का क्या ....... - अम्बुआ की डाली पर चाहे न कुहुके कोयल किसी अलसाई शाम से चाहे न हो गुफ्तगू कोई बेनामी ख़त चाहे किसी चौराहे पर क्यों न पढ़ लिया जाए ज़िन्दगी का कोई नया शब्दक...
    • पहाड़ों के बीच बसा अलसीगढ़ - #हिन्दी_ब्लागिंग मनुष्य प्रकृति की गोद खोजता है, नन्हा शिशु भी माँ की गोद खोजता है। शिशु को माँ की गोद में जीवन मिलता है, उसे अमृत मिलता है और मिलती है सुरक...
    • केवल राष्ट्र के लिए था यह सृजन - देश की स्वतंत्रता के लिए 1857 से लेकर 1947 तक क्रान्तिकारियों व आंदोलनकारियों के साथ ही लेखकों, कवियों और पत्रकारों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय...
    • कृष्ण लीला - ग्वाल बाल साथ ले कान्हा ने धूम मचाई गोकुल की गलियों में ! खिड़की खुली थी घर में छलांग लगाई खाया नवनीत खिलाया मित्रों को भी कुछ खाया कुछ फैलाया आहट ...
    • नींद बनाम ख्व़ाब - मैंने अपनी नींदें बेच, कुछ ख्वाब खरीदे थे। रख दिया था सहेज कर, उन्हें अपनी पलकों तले। वक़्त की बारिशों औ आंधी से, कुछ उड़ गए, कुछ बह गए। कुछ को बचाया जतन...
    • तुम राम बनके दिल यूँ ही दुखाते रहोगे . - [image: Image result for seeta agni pariksha image] अवसर दिया श्रीराम ने पुरुषों को हर कदम , अग्नि-परीक्षा नारी की तुम लेते रहोगे , करती रहेगी सीता सदा मर्य...
    • - गज़ल 1 मुहब्बत से रिश्ता बनाया गया उसे टूटते रोज पाया गया मुहब्बत पे उसकी उठी अँगुलियाँ सरे बज़्म रुसवा कराया गया यहाँ झूठ बिकता बड़े भाव पर मगर सच को ठेंगा द...
    • माँ तुझे प्रणाम - *माँ तुझे प्रणाम* *शत शत नमन कोटि प्रणाम * *माँ तुझे प्रणाम ।* *जब मैं तेरी कोख में आई * *तूने स्पर्श से बताया था * *ममता का कोई मोल नहीं * *तूने ही सि...
    • जाने कहाँ गया वो दिन??? - "आज कुछ special बना दो, Sunday है... " ... अभी तो परसों कढ़ाही पनीर बनी थी... "सुनो, मैं अपने दोस्तों से मिल कर आ रहा हूँ, वो आज Sunday है न..." ... हाँ, द...
    • अधूरे हम... - एक युवक बगीचे में खिन्न मुद्रा में बैठा था । एक बुजुर्ग ने उस परेशान युवक से पूछा - क्या हुआ बेटा क्यूं इतने परेशान हो ? युव...
    • नया साल ! - समर घर से निकला तो पत्नी और बच्चों के लिए गिफ्ट पहले ही खरीदता हुआ होटल पहुंचा था। रात में प्रोग्राम ख़त्म करके सीधे घर भागेगा क्यो...
    • वेदों में गायन कला - *- डॉ. शरद सिंह* *गायन मानव की संवेदनाओं को जागृत करता है.आज दुनिया भर में संगीत के महत्व पर वैज्ञानिक शोध हो रहे हैं . पाश्चात्य जगत के व...
    • भ्रष्ट आचार - स्वतंत्र भारत की नीव में उस समय के नेताओं ने अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के रख दिये थे भ्रष्ट आचार फिर देश से कैसे खत्म हो भ्रष्टाचार ?
    • उदास आँखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान (भाग -9) - *(रात में बेटी के फोन की आवाज़ से जग कर वे,अपना पुराना जीवन याद करने लगती > हैं.उनकी चार बेटियों और दो बेटों से घर गुलज़ार रहता. पति गाँव के स्कूल में > ...

    मन की दुनिया

    नारी का पूर्ण सशक्तिकरण

     
    Copyright (c) 2010 प्यारी माँ. All rights reserved.