तू ऐसी तो न थी माँ ---?

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  • Wednesday, February 16, 2011
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  • दर्शन कौर धनोय
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  • तुझे चाह था टूटकर मैने माँ---  
    हर घड़ी, हर पल,  
    तुझे महसूस किया था माँ,
    दिल के पास --बहुत पास माँ, 
    आज भी हे ,
    दिल में ,
    तेरे प्यार का एहसास ,
    तुझसे यह उम्मीद तो न थी माँ ---
    की तू मुझे यू अकेला छोड़ जाएगी ---
    दिल मायूस  मेरा,
    ज़बा खामोश है ,
    आँखों से बहती आंसू की धारा,
    हर आंसू का कतरा --
    तुझसे शिकायत करता हे माँ ---
    तू ऐसी तो न थी माँ ---
    तू ऐसी तो न थी माँ ---?


    माँ की यादे , माँ का प्यार मेरे लिए सिर्फ यादे हे जो मै महसूस करती हु वही लिखती हु -------दर्शन !  )            

    6 comments:

    रश्मि प्रभा... said...

    maa kabhi nahi jati , haath badhaao mil jati hai, chum leti hai , mann ke sare tufaan per jadui chhadi chalati hai...

    DR. ANWER JAMAL said...

    जो अश्क गूंगे थे वो अर्ज़े हाल करने लगे
    हमारे बच्चे हमीं से सवाल करने लगे

    ऐसा ही कुछ आपकी माता जी भी आपसे कहती होंगी।

    वन्दना said...

    आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (17-2-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

    दर्शन कौर धनोए said...

    जनाब अनवर साहब,आपने ठीक फरमाया, कभी कभी बच्चे भी माँ -बाप से सवाल करते हे ? अपनी इस उम्र मे आकर भी मुझे अपनी माँ की कमी खलती हे --अपने हम-उम्र की माँऐ जब अपने बच्चो की खेर- खबर करती हे तो दिल में एक हुक सी उठती हे की मेरी माँ क्यों नही ? तब आता हे अपनी किस्मत पर,अपने खुदा पर और अपनी माँ पर भी गुस्सा ! क्यों अकेला छोड़ गई मुझे ?जब मै सबको माँ के बारे में लिखता देखती हु तो सोचती हु की क्या एहसास लिखू जबकि मै इस एहसास से ही महरूम हु --यदि कुछ गलत लिखा हो तो माफ़ी चाहती हु |

    DR. ANWER JAMAL said...

    @ दर्शन जी ! जो पीड़ा आपके दिल में है उसे व्यक्त होना ही चाहिए .
    आपकी पीड़ा आपकी मां तक पहुँचती है और वो आपको दुलारती भी हैं .
    मैं कोई अलंकार में नहीं कह रहा हूँ .
    आप जब चाहे अपनी मां से मिल सकती है और उनसे बातें भी कर सकती हैं.
    हर चीज़ आपके विश्वास और आपकी प्रार्थना पर टिकी हुई है .
    जिसके पास यह दोनों हैं उसे विधि मैं बता सकता हूँ .
    बिलकुल आसान और निरापद विधि है.
    मां कभी जुदा नहीं होती और
    रूहों से कभी फासला नहीं होता .

    डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

    बहुत सुंदर संवेदनशील रचना गढ़ी है दर्शन जी ...... आभार

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