Skip to main content

शराब के नशे में 65 साल की सास के साथ किया रेप Rape with Mother in law

rape.jpg
नागपुर।। नागपुर में एक शर्मनाक घटना सामने आई है। आरोप के मुताबिक, यहां पर शराब के नशे में एक शख्स ने अपनी 65 साल की सास का रेप कर दिया। घटना के बाद से ही आरोपी रमेश गव्हाणे फरार है। रेप की शिकार महिला की बेटी ने कोराडी पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई है। पुलिस गव्हाणे की तलाश में जुट गई है।

पुलिस का कहना है कि सोमवार की रात गव्हाणे की पत्नी अपनी बेटी को उसके ससुराल काटोल पहुंचाने गई थी। उसी रात 11 बजे गव्हाणे शराब के नशे में घर लौटा। पहले उसने अपने बेटे को पीटा और उसे घर से बाहर निकलने को कहा। उस समय उसकी सास सो रही थीं। गव्हाणे ने उन पर हमला बोल दिया और फिर उनके साथ रेप किया। गव्हाणे 3 बच्चों का बाप है।

पुलिस सब इंस्पेक्टर पी.वी. फाडे ने बताया, 'पड़ोस में रहने वाली एक औरत अगले दिन जब गव्हाणे की सास से मिलने आई तो उनकी साड़ी पर लगे खून के धब्बे से उसको शक हुआ कि कुछ गलत हुआ है। जब उसने इस बाबत पूछा तो पीड़िता रोने लगीं और उन्होंने पूरी घटना के बारे में उसको बताया। पड़ोसन ने तुरंत कोराडी पुलिस को खबर दी और रमेश की बीवी को भी इसकी सूचना दी।'

फाडे ने आगे बताया कि गव्हाणे पहले भी कई औरतों के साथ बदसलूकी कर चुका है, पर उसकी पत्नी के अच्छे व्यवहार के चलते किसी भी महिला ने उसके खिलाफ शिकायत दर्ज नहीं कराई थी। पीड़िता को इंदिरा गांधी गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया है और उन्हें वहां पर 15 दिनों तक रखा जाएगा। पुलिस का कहना है कि पीड़िता के पास हॉस्पिटल का खर्च उठाने के लिए पैसे भी नहीं हैं।

Comments

इस घटना के बारे में मैंने पढ़ा था लेकिन इस पर टिप्पणी करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं थे. पुरुष का यह रूप जिसमें बुद्धि और विवेक का नाम न रह जाए वह पशु से भी बदतर है. और क्या कहा जा सकता है? ऐसे लोगों को ऐसा दंड दिया जन चाहिए कि वे दुबारा इस बारे में सोच भी न सकें. इस पारध के लिए क्षम अजैसा कोई शब्द बना ही नहीं है.
Sanju said…
Very nice post.....
Aabhar!
Mere blog pr padhare.

Popular posts from this blog

माँ बाप की अहमियत और फ़ज़ीलत

मदर्स डे पर विशेष भेंट  इस्लाम में हुक़ूक़ुल ऐबाद की फ़ज़ीलत व अहमियत इंसानी मुआशरे में सबसे ज़्यादा अहम रुक्न ख़ानदान है और ख़ानदान में सबसे ज़्यादा अहमियत वालदैन की है। वालदैन के बाद उनसे मुताल्लिक़ अइज़्जा वा अक़रबा के हुक़ूक़ का दर्जा आता है डाक्टर मोहम्मद उमर फ़ारूक़ क़ुरैशी 1 जून, 2012 (उर्दू से तर्जुमा- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम) दुनिया के हर मज़हब व मिल्लत की तालीमात का ये मंशा रहा है कि इसके मानने वाले अमन व सलामती के साथ रहें ताकि इंसानी तरक़्क़ी के वसाइल को सही सिम्त में रख कर इंसानों की फ़लाहो बहबूद का काम यकसूई के साथ किया जाय। इस्लाम ने तमाम इंसानों के लिए ऐसे हुक़ूक़ का ताय्युन किया है जिनका अदा करना आसान है लेकिन उनकी अदायगी में ईसार व कुर्बानी ज़रूरी है। ये बात एक तरह का तर्बीयती निज़ाम है जिस पर अमल कर के एक इंसान ना सिर्फ ख़ुद ख़ुश रह सकता है बल्कि दूसरों के लिए भी बाइसे राहत बन सकता है। हुक़ूक़ की दो इक़्साम हैं । हुक़ूक़ुल्लाह और हुक़ूक़ुल ऐबाद। इस्लाम ने जिस क़दर ज़ोर हुक़ूक़ुल ऐबाद पर दिया है इससे ये अमर वाज़ेह हो जाता है कि इन हुक़ूक़ का कितना बुलंद मुक़ाम है और उन...

क्या अपाहिज भ्रूणों को मार देने के बाद भी डाक्टर को मसीहा कहा जा सकता है ? 'Spina Bifida'

मेरी बेटी अनम का नाम हिंदी ब्लॉग जगत के लिए एक जाना पहचाना नाम है। हिंदी ब्लॉग जगत में उसकी उम्र के किसी बच्चे का  इतना चर्चा नहीं हुआ, जितना कि उसका हुआ है। यह ठीक वही वक्त है जब हमने अपनी प्यारी अनम को उसके झूले में मृत पाया था। आज से ठीक एक साल पहले 21 और 22 जुलाई की दरम्यानी रात को जब वह सोई तो हम नहीं जानते थे कि सुबह को उसके पालने से जब हम उसे उठाएंगे तो वह हमें एक बेजान लाश की शक्ल में मिलेगी। महज़ 22 दिन इस दुनिया में रहकर वह चल बसी और अच्छा ही हुआ कि वह चल बसी। 'Spina Bifida' की वजह से वह पैदाइशी तौर पर एक अपाहिज बच्ची थी। उसकी दोनों टांगें बेकार थीं। उसके सिर की हड्डियों के बनने में भी कुछ कमी रह गई थी और उसकी रीढ़ की हड्डी भी तिरछी थी। उसकी पैदाइश से पहले जब लेडी डाक्टर मीनाक्षी राना ने उसकी सेहत को जांचने के लिए अल्ट्रा साउंड करवाया तो ये सब बातें उसकी रिपोर्ट में सामने आ गईं। डाक्टर मीनाक्षी ने कहा कि इस बच्ची को पैदा नहीं होने देना है, यह अपाहिज है और आपके किसी काम की नहीं है। हमने पूछा कि यह ज़िंदा तो है न ? उन्होंने कहा कि हां ज़िंदा तो है। तब हमने कहा कि वह ...

माँ The mother (Urdu Poetry Part 2)

हम  बलाओं में कहीं घिरते हैं तो बेइख्तियार ‘ख़ैर हो बच्चे की‘ कहकर दर पे आ जाती है माँ दूर हो जाता है जब आँखों से गोदी का पला दिल को हाथों से पकड़कर घर को आ जाती है माँ दूसरे ही दिन से फिर रहती है ख़त की मुन्तज़िर दर पे आहट हो हवा से भी तो आ जाती है माँ चाहे हम खुशियों में माँ को भूल जाएँ दोस्तो ! जब मुसीबत सर पे आती है तो याद आती है माँ दूर हो जाती है सारी उम्र की उस दम थकन ब्याह कर बेटे की जब घर में बहू लाती है माँ छीन लेती है वही अक्सर सुकूने ज़िंदगी प्यार से दुल्हन बनाकर जिसको घर लाती है माँ हमने यह भी तो नहीं सोचा अलग होने के बाद जब दिया ही कुछ नहीं हमने तो क्या खाती है माँ ज़ब्त तो देखो कि इतनी बेरूख़ी के बावुजूद बद्-दुआ देती है हरगिज़ और न पछताती है माँ अल्लाह अल्लाह, भूलकर हर इक सितम को रात दिन पोती पोते से शिकस्ता दिल को बहलाती है माँ बेटा कितना ही बुरा हो, पर पड़ोसन के हुज़ूर रोक कर जज़्बात को बेटे के गुन गाती है माँ शादियाँ कर करके बच्चे जा बसे परदेस में दिल ख़तों से और तस्वीरों से बहलाती है माँ अपने सीने पर रखे है कायनाते ज़िंदगी ये ज़मीं इस वास्ते ऐ दोस्त कहलाती है...