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हमारी मां की दुआ-सी दुआ किसी की नहीं

है सब नसीब की बातें खता किसी की नहीं
ये जि़दगी है बड़ी बेवफा किसी की नहीं।

तमाम जख्म जो अंदर तो चीखते हैं मगर
हमारे जिस्म से बाहर सदा किसी की नहीं।

वो होंठ सी के मेरे पूछता है चुप क्यों हो
किताबे-ज़ुर्म में ऐसी सज़ा किसी की नहीं।

बड़े-बड़े को उड़ा ले गई है तख्त केसाथ
चरा$ग सबके बुझेंगे हवा किसी की नहीं।

'नज़ीर सबकी दुआएं मिली बहुत लेकिन
हमारी मां की दुआ-सी दुआ किसी की नहीं।

Comments

अच्छी रचना के लिए बधाई |
आशा
DUSK-DRIZZLE said…
BAHUT HI UMADA RACHANA HAI ....
Pallavi saxena said…
अच्छी रचना मगर हर माँ की दुआ में असर होता है क्यूंकि माँ सिर्फ माँ होती है मेरी तेरी नहीं .....तभी तो उसे ईश्वर ने भी अपने से ऊपर का दर्जा दिया है है ना :-)
Unknown said…
'नज़ीर सबकी दुआएं मिली बहुत लेकिन
हमारी मां की दुआ-सी दुआ किसी की नहीं।..
माँ को समर्पित अति भावपूर्ण रचना....
शुभकामनायें !!
चंदन said…
माँ के प्यार को दर्शाती सुन्दर रचना!