'पुत्र ऋण' !

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  • Wednesday, January 19, 2011
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  • रेखा श्रीवास्तव
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  •                            माँ तो सदा माँ ही होती है, जननी होती है और जगत्प्रसूता होती है. एक मांस के टुकड़े को कैसे वह वाणी, विचार और संस्कार देकर मानव बनाती  है इसको कोई और नहीं कर सकता है. इसी लिए अगर मानव वाकई मानव है तो वह कहता है कि माँ के  ऋण से कोई मुक्त नहीं हो सकता है. लेकिन समय और संस्कृति के परिवर्तन ने उसका भी विकल्प खोज लिया है और संतान ने भी तो उस  विकल्प को  अंगीकार कर लिया है. ये अपवाद नहीं है बल्कि किसी न किसी रूप में ऐसे इंसान आज मिल रहे हैं कि माँ के त्याग और तपस्या को पैसों से तौल कर उनका कर्ज पैसे से अदा करने के लिए तैयार हैं. एक छोटी से कहानी - मेरी अपनी नहीं लेकिन बचपन में कहीं पढ़ी थी.
                             वो माँ जिसने बेटे और बेटियों को जन्म दिया और फिर क्षीण काया लिए कभी इस बेटे के घर और कभी उस बेटी के घर सहारा खोजने पर मजबूर होती है. ऐसी ही एक विधवा माँ अपने बेटे के आश्रय में अपने जीवन संध्या के क्षण गुजर रही थी. उसकी पत्नी से नहीं ये नहीं सुहाता था. ( सिर्फ पत्नी को दोष नहीं दे रही बल्कि हर इंसान की अपनी बुद्धि होती है और निर्णय लेने की क्षमता भी होती है. ) अपना तिरस्कार देखते देखते एक दिन माँ आजिज आ गयी और बेटे से बोली कि क्या इसी दिन के लिए मैंने तुम्हें जन्म दिया था?
    " ठीक है, जन्म दिया था तो एक बार बता दो कि तुम्हें मैं कितना दे दूं कि आपके उस ऋण से मुक्त हो जाऊं. " बेटे ने सपाट शब्दों में कहा.
    " किस किस की कीमत दोगे बेटा ?" माँ ने बड़े निराशा भरे शब्दों में कहा.
    "आप बतलाती जाइए मैं चैक काट देता हूँ. "
    "सबसे पहले जो मैंने ९ महीने तुम्हें अपने गर्भ में पाला है , उसकी कोई कीमत है तेरे पास."
    "हाँ है, आप महंगे से महंगे फ्लैट के किराये के बराबर ९ महीने की जगह २ साल का किराया  ले लीजिये. "
    "जो सीने से लगा कर तुम्हें ठण्ड , धूप और बारिश से बचा कर इतना बड़ा किया उसका कोई मोल है?"
    "आप ही लगा दीजिये मैं देने को तैयार हूँ."
                   माँ समझ गयी कि बेटे का सिर फिर गया है और ये वास्तविकता  से बिल्कुल दूर हो गया है. पैसे के अहंकार ने इसको पागल बना दिया है और ये अहंकार कल को इसके लिए बहुत बड़ी मुसीबत का कारण बन सकती है और मैं इसकी आँखों पर पड़े इस परदे को जरूर हटा दूँगी.
                 उस रात बेटा अपने कमरे में सोया था और माँ ने जाकर उसके बिस्तर में एक गिलास पानी डाल दिया. गहरी नीद में डूबा बेटा वहाँ से दूर खिसक गया और फिर सो गया. माँ ने वही काम उसके दोनों ओर किया . जब दोनों ओर बिस्तर गीला हो गया तो वह उठ बैठा और माँ को वहाँ देख कर चिल्लाया - ये क्या है माँ? मुझको सोने क्यों नहीं देती हो? ये पानी क्यों डाल रही हो? "
    " बेटा , मैं तो कुछ भी नहीं कर रही हूँ, तुम्हें पुत्र ऋण से मुक्त करने का प्रयास कर रही हूँ, ताकि इस घर से जाने से पहले कोई मलाल न रह जाये कि मैं ऐसा कुछ यहाँ छोड़ गयी हूँ, जिसके बोझ  तले मेरा लाल दबा न रह जाए. "
    "वह तो ठीक है लेकिन ये पानी डालने का क्या मतलब है?"
    "बेटा , इसी तरह से जब तुम बिस्तर गीला करते थे और मैं खुद गीले बिस्तर में लेट कर तुम्हें सूखा बिस्तर देती थी , पता नहीं कितने महीनों और सालों तक नहीं सोयी थी कि कहीं मेरा लाल गीले में न पड़ा हो. उस ऋण से तुम्हें मुक्त करना है. इसी लिए अब उसको भी वसूल करती चलूँ फिर घर छोड़ दूँगी."
                   माँ ने इन शब्दों ने शायद बेटे के भ्रम को तोड़ दिया और धन ने मद में डूबा बेटा यथार्थ के धरातल पर आ गया और माँ से अपने शब्दों और व्यवहार के लिए क्षमा मांगी.

    10 comments:

    DR. ANWER JAMAL said...

    एक उम्दा नसीहत देने वाली कहानी .
    कहानी का हर पक्ष उम्दा है .
    आदमी अपने बच्चे को अच्छे स्कूल में प्रवेश दिलाता है और फिर साल गुज़रने पर वह देखता है कि उसके बच्चे ने जो मेहनत की उसका फल उसे क्या मिला ?
    बेहतर फल के लिए ही आदमी अपने बच्चों को शिक्षा दिलाता है। इनसान नेकी का भी फल चाहता है। लेकिन कभी तो यह फल उसके जीते जी उसे मिल जाता है लेकिन कभी उसे इस जीवन में उसकी नेकी का फल नहीं मिल पाता।बुरा इनसान अपने बुरे कामों का फल नहीं भोगना चाहता, लेकिन फिर भी उसके बुरे कामों का बुरा नतीजा उसे इसी जीवन में भोगना पड़ता है लेकिन कभी वह बिना उसे भोगे ही मर जाता है।फल मिलना स्वाभाविक है। फल देने वाला ईश्वर है।

    Anjana (Gudia) said...

    achchi seekh deti kahani. sach hai maa ka pyar kabhi chukaya nahi jaa sakta. Shukriya, Rekha ji.

    विश्‍व गौरव said...

    बेशक मां का कर्ज चुकाया नहीं जा सकता

    DR. ANWER JAMAL said...

    @ बहन रेखा जी और अंजना जी ! मैंने अपने वादे के मुताबिक़ एक लेख लिखा है .
    कृपया आप और दीगर सभी लोग उसे एक नज़र देख लीजिये और बताइए की उसमें क्या कमी है ?
    आपकी महरबानी होगी .
    गुस्से की ऊर्जा से काम लेना सीखिए ? The energy of anger

    एस.एम.मासूम said...

    रेखा जी बहुत ही उम्दा पोस्ट .
    .

    HAKEEM YUNUS KHAN said...

    अंजना जी , रेखा जी और मीनाक्षी जी की आमद और शिरकत का मैं ख़ैर मक़दम करता हूँ .
    अंजना जी और रेखा जी की पोस्ट्स क़ाबिले तहसीन हैं . अब हमें मीनाक्षी जी की पोस्ट का इंतज़ार है.
    मैं नेट पर कम वक़्त दे पा रहा हूँ , इसलिए देर से हाज़री के लिए माज़रत ख्वाह हूँ .
    बराय मेहरबानी मेरे ब्लाग्स भी जोड़ लिए जाएँ.

    DR. ANWER JAMAL said...

    मीनाक्षी जी की आमद और शिरकत का मैं भी ख़ैर मक़दम करता हूँ . उनका आना हम सभी के लिए ख़ुशी का बायसहै .
    स्वागतम .

    ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

    मन को छू जाने वाले भाव।

    -------
    क्‍या आपको मालूम है कि हिन्‍दी के सर्वाधिक चर्चित ब्‍लॉग कौन से हैं?

    Minakshi Pant said...

    बहुत खुबसूरत प्रेरणादायक रचना ये बिलकुल सच बात है की हम माँ के क़र्ज़ को किसी भी तरह पूरा नहीं कर सकते मेरे ख्याल से एसा सोचना भी पाप है क्युकी जिंदगी में सभी रिश्ते दुबारा बनाये जा सकते हैं मगर माँ का रिश्ता कभी नहीं इसलिए माँ का अपमान खुदा के अपमान के बराबर होगा !

    Lucy Saputri said...

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